मां गौरा की तपोस्थली गौरीकुंड और मूर्ति। यहां महिलाएं पूजा करती हैं।
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मणिमहेश यात्रा के दौरान गौरीकुंड पड़ाव से श्रद्धालु गंगाजल लेकर नहीं जाते हैं। मान्यता है कि गौरीकुंड के पास से जब कोई गंगाजल लेकर गुजरता है तो कुंड के पानी में उबाल आने लगता है। इतना ही नहीं, यदि कोई गलती से भी गौरीकुंड में गंगाजल की एक बूंद भी डाल दे तो यह कुंड पूरी तरह सूख जाता है। ऐसे में जो भी श्रद्धालु डल झील पर गंगा जल चढ़ाने के लिए लाते हैं, वे दूसरे रास्ते से ही अगले पड़ाव के लिए रवाना हो जाते हैं।
महंत आकाश गिरि और महाकाल गिरी बताते हैं कि मां गौरा ने भगवान शंकर को पाने के लिए कठोर तप यहीं पर किया था। आज भी देवता यहां भगवान शंकर की भक्ति में लीन रहते हैं। महंत आकाश गिरी और महाकाल गिरी बताते है कि गौरीकुंड मां की तपस्थली है। यहां आज भी देवता भगवान शंकर की तपस्या में लीन हैं।