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आपका मुद्दा: अंतिम सांसें गिन रही पीच वैली राजगढ़, सांसदों की अनदेखी से नहीं मिली संजीवनी

Wed, 15 May 2024 11:12 AM IST
Krishan Singh सुरेश शांडिल्य/वेद प्रकाश ठाकुर, राजगढ़

सार

जिला शिमला को अगर सेब उत्पादन के लिए जाना जाता है तो सिरमौर जिले की यह घाटी आड़ू की पैदावार के लिए मशहूर है।
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पीच वैली राजगढ़ - फोटो : संवाद
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विस्तार
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जैसे ही यशवंतनगर से ऊपर राजगढ़ की चढ़ाई चढ़ते हैं तो सड़क किनारे हरे लहलहाते आड़ू के बाग नजर आते हैं। पेड़ों पर पकते फलों को देखकर मुंह में पानी आ जाता है। इसी राजगढ़ को पीच वैली भी कहते हैं। जिला शिमला को अगर सेब उत्पादन के लिए जाना जाता है तो सिरमौर जिले की यह घाटी आड़ू की पैदावार के लिए मशहूर है। आजकल लोकसभा चुनाव प्रचार के बीच इसकी अनदेखी का मुद्दा फिर उठने लगा है। बागवान दुखड़ा सुनाते हैं कि इस ओर कभी सांसदों का ध्यान नहीं गया। सेब की तरह अगर आड़ू का भी समर्थन मूल्य घोषित हो जाता तो पीच वैली का अस्तित्व बच जाता। यहां पर विधायन केंद्र चालू होते तो यहीं पर अच्छे रेट में फल बिक्री हो जाती। बहुत से बागवान विवश होकर आड़ू के पुराने पेड़ काट रहे हैं और सेब, प्लम, कीवी या दूसरे फलों के पौधे उगा रहे हैं। ब्यूरो/संवाद
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लागत तीन गुना बढ़ गई, दाम वही दस-बीस साल पुराने 
राजगढ़ क्षेत्र के सेर मनोण गांव के 70 वर्षीय बागवान सुरेंद्र तोमर के बगीचे में आड़ू के करीब 500 पेड़ हैं। उन्होंने पुरानी वैरायटी जुलाई अल्बर्टा के अलावा रेड हेवल, सन हेवन, नैनीताल की मशहूर पैरा डीलक्स जैसी अर्ली किस्में लगाई हैं। फसल तैयार होने वाली है, पर उनका पिछले कुछ वर्षों का अनुभव यह है कि वही दस-बीस साल पुराने दाम मिल रहे हैं। लागत तीन से चार गुना बढ़ गई है। सारा खेल बिचौलिये बिगाड़ रहे हैं। दस-बीस गाड़ियां मार्केट में आ गईं ताे कहने लगते हैं कि बहुत माल आ गया और रेट गिरा दिए जाते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य ही घोषित नहीं हो पाया। कोई भी सांसद क्यों न रहा हो, इस तरफ ध्यान नहीं दिया।

अच्छे दाम न मिलने से सेब उगाने लगे लोग
राजगढ़ से 12 किलोमीटर दूर हाब्बन सड़क के साथ भाणत गांव के बागवान देवराज के पास आड़ू के 2000 पेड़ हैं। कहते हैं कि नई दिल्ली में रेट नहीं मिल रहे। सेब की तरह स्थानीय मंडियों में बोली नहीं लगती। लोग मजबूरन आड़ू के पेड़ काटकर अरली किस्मों के सेब उगा रहे हैं। बागवानी विश्वविद्यालय नौणी एकदम नजदीक है, पर यह इस फसल को फाइटोप्लाज्मा जैसी खतरनाक बीमारियों से नहीं बचा पा रहा है। मनोण निवासी बागवान विनोद तोमर और रविदत्त भारद्वाज ने कहा कि उचित दाम न मिलने पर उन्होंने भी सेब, प्लम व कीवी के बगीचे लगा दिए हैं। हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार ने तीन फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिट धौलाकुआं, बागथन और राजगढ़ में स्थापित किए थे, जो अब बंद हैं।

स्व. लक्ष्मीचंद वर्मा ने सबसे पहले लगाए थे आड़ू के पौधे
70 के दशक में भाणत निवासी स्व. लक्ष्मीचंद वर्मा ने सबसे पहले आड़ू के पौधे खेतों में लगाए तो लोग उन्हें ताने देते थे कि उनका परिवार तो भूखों मर जाएगा। उनकी इससे अच्छी आमदनी हुई तो राजगढ़ के एक बड़े क्षेत्र के लोग आड़ू के बगीचे लगाने लगे। 2000 के पहले दशक तक करीब पांच हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फसल उगाई जाने लगी और उत्पादन 7-8 हजार मीट्रिक टन तक पहुंचा। इसे देखते हुए 5 मई 2005 को तत्कालीन सरकार ने राजगढ़ क्षेत्र को पीच वैली आॅफ हिमाचल घोषित किया। सेवानिवृत्त उपनिदेशक उद्यान डाॅ. एसके कटोच ने बताया कि अब जिले में आड़ू का क्षेत्र घटकर 5-6 सौ हेक्टेयर तक सिमट चुका है और उत्पादन भी मात्र 7- 8 सौ मीट्रिक टन रह गया है।

एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे नेता
पच्छाद कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष राजेंद्र ठाकुर ने कहा कि पूर्व में भाजपा सरकारों व सांसदों ने राजगढ़ क्षेत्र में आड़ू के उत्पादन में हो रही  गिरावट पर ध्यान नहीं दिया और न ही समर्थन मूल्य देने या विधायन के लिए कदम उठाया। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सूक्खू जरूर कोई समाधान निकालेंगे। भाजपा मंडल पच्छाद के पूर्व अध्यक्ष प्रताप ठाकुर ने कहा कि वर्षों तक कांग्रेस की सरकारें व सांसद रहे। उन्होंने आड़ू को समर्थन मूल्य दिलाने के या अन्य कोई काम नहीं किए। भाजपा चुनाव के बाद इस मामले को प्रभावी ढंग से उठाएगी।
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सेब की ओर रुझान बढ़ने से घटा क्षेत्र : कश्यप
निवर्तमान सांसद सुरेश कश्यप ने बताया कि आड़ू उत्पादन कम होने का कारण लोगों का सेब उगाने की ओर बढ़ा रुझान है। आड़ू में लग रही बीमारी भी एक वजह है। यह सही है कि प्रोसेसिंग यूनिट बंद हो गए। वह जब विधायक थे तो भी आड़ू उत्पादकों की समस्याएं उठाते रहे हैं। सांसद रहते भी इनसे अवगत रहे हैं। इन मसले को आगे और उठाएंगे।

15 सालों से भाजपा के ही रहे सांसद : शांडिल
शिमला संसदीय सीट के पूर्व कांग्रेस सांसद और सुक्खू सरकार में स्वास्थ्य मंत्री कर्नल धनीराम शांडिल का कहना है कि पिछले तीन कार्यकाल में भाजपा से ही लोकसभा सदस्य चुनकर गए, यह प्रश्न अगर उन्हीं से पूछा जाए तो उचित होगा। पीच वैली का अस्तित्व बचाया जाना चाहिए। आड़ू को अच्छे दाम दिलाकर ही यह संभव होगा।
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