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आत्महत्या की कोशिश करने वालों पर न हो कानूनी कार्रवाई, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Thu, 28 Nov 2019 09:20 PM IST
Krishan Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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फाइल फोटो
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हाईकोर्ट ने आत्महत्या की कोशिश करने वालों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। ऐसे मामलों को लेकर दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि जो व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है, वह गंभीर तनावग्रस्त रोगी माना जाएगा और उसके खिलाफ  कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा।

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 न्यायाधीश संदीप शर्मा ने राज्य के मुख्य सचिव को आदेश दिए हैं कि वह पुलिस को तुरंत प्रभाव से दिशा-निर्देश जारी करे कि मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 की धारा 115 में निहित प्रावधानों का कड़ाई से अनुपालन करे। न्यायाधीश शर्मा ने कहा कि आत्महत्या के प्रयास को गैर अपराधीकरण घोषित करने के बारे में दुनिया के विभिन्न देशों ने पहले ही कदम उठा लिए हैं।

भारत सरकार पहले ही मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 अधिनियमित कर चुकी है। अदालत ने भारत सरकार के सचिव गृह को भी आदेश दिए कि वह उचित स्तर पर मामले को उठाए। अदालत ने उक्त आदेश प्रतिभा शर्मा द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किए। याचिका में प्रार्थी ने गुहार लगाई थी कि पुलिस ने उसके खिलाफ  आत्महत्या का प्रयास किए जाने पर प्राथमिकी दर्ज कर सक्षम अदालत में मुकदमा चलाया था। 

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जांच के समय ही एकत्र कर लें अपराधी का पूरा ब्योरा: हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में जांच से जुड़े विभिन्न पहलुओं में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस को अपराधियों की जांच करते समय उनके बारे में पूरा ब्योरा इकट्ठा कर लेना चाहिए। वरिष्ठ न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी और न्यायाधीश अनूप चिटकारा की खंडपीठ ने आपराधिक मामले से जुड़ी एक अपील की सुनवाई के दौरान ये आदेश पारित किए।

कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक और प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों को इस बाबत जरूरी निर्देश जारी करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराधियों की उनके चरित्र और चल-अचल संपत्तियों से जुड़ी पूरी जानकारी इकट्ठी करनी चाहिए। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि अपराधी को जमानत देते वक्त यह शर्त रखी गई थी कि वह अपने और उसके जमानती की ओर से अरेस्टिंग अथॉरिटी की संतुष्टि के लिए 20 हजार के मुचलके पेश करेगा।

कोर्ट ने पाया कि अभियुक्त ने जो अपना पता दिया था। वह उसके किराए पर लिये आवास का था। जिसे वह 9 साल पूर्व छोड़कर चला गया था। इसके अलावा उसका संबंधित पंचायत में कोई में रिकॉर्ड नहीं पाया गया। न्यायालय ने यह पाया कि विशेषतया विदेशी अभियुक्तों के मामले में यह देखा गया है कि भारत में किराये पर लिए मकान का पता दे देते हैं और आपराधिक मामलों में संलिप्त होने के बाद विदेश चले जाते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब जांच अधिकारी ऐसे मामलों की जांच करते हैं तो अपराधी के असली पते की छानबीन करनी चाहिए। कोर्ट ने इसके अलावा ट्रायल कोर्ट को भी यह सुनिश्चित करने को कहा कि मामले में रिहा करने से पूर्व जब अपराधियों से उनके निजी मुचलके पेश करने को कहा जाता है तो उस समय ट्रायल कोर्ट को भी उनके पते के बारे में पूरी तरीके से सुनिश्चित कर लेना चाहिए। 
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