फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दांतों के सबसे बडे़ सरकारी अस्पताल को नेताओं ने बना दिया तमाशा

Tue, 24 Oct 2017 01:47 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
विज्ञापन
विज्ञापन
हिमाचल में नेताओं ने दांतों के सबसे बड़े अस्पताल को तमाशा ही बना दिया है। राज्य के सबसे बड़े सरकारी दंत महाविद्यालय और अस्पताल शिमला में 30 साल पुरानी तकनीक अपनाकर ही दांतों और जबड़ों का इलाज चल रहा था, अब वो भी बंद हो गया है। इस अस्पताल में नई तकनीक से एक्स-रे करना दूर की बात है।
विज्ञापन


जो पुरानी तकनीक की मशीनें हैं, वे भी अब ठप पड़ी हैं। क्षतिग्रस्त जबड़ों के एक्स-रे करने हों तो मरीजों को चंडीगढ़ भेजना पड़ रहा है। उसके बाद ही इस अस्पताल में सर्जरी और अन्य इलाज हो पाता है। इस तमाशे से दंत चिकित्सा परिषद के तय मानकों की भी धज्जियां उड़ रही हैं। 

विधायकों की तनख्वाहें और वेतन-भत्तों को चुटकियों में बढ़ा देने वाली हिमाचल की सरकारें प्रदेश के आम लोगों को छोटी-मोटी चिकित्सा सुविधा दिलाने को कतई गंभीर नहीं रही हैं। इसका उदाहरण हिमाचल का यह अकेला राजकीय दंत महाविद्यालय शिमला है। इस डेंटल कॉलेज में एक्स-रे की तीन मशीनें शोपीस बनी हैं।
विज्ञापन


इनमें से एक मशीन वर्ष 1999 में आईजीएमसी शिमला से दंत महाविद्यालय लाई गई। यह सामान्य एक्स-रे की मशीन है। एक अन्य मशीन ओपीजी सेफ (ऑरथोपेनटोनोग्राफी सेफलोग्राफी) को वर्ष 2007 में खरीदा गया।

इसमें जबड़े के एक्स-रे होते हैं। जिसके बिना सर्जरी नहीं हो सकती। ये दोनों ही मशीनें खराब हैं। दांतों के छोटे एक्स-रे निकालने की एक छोटी मशीन भी पिछले काफी वक्त से खराब है। इन्हें ठीक करने को पर्याप्त बजट भी नहीं है। पिछले एक दशक से अस्पताल का प्रशासन नई तकनीकी की मशीनें मांग रहा है, मगर इस पर सरकार का गौर नहीं। 

आरवीजी मशीनों से होते हैं आधुनिक एक्स-रे, अस्पताल में धोए जा रहे नेगेटिव 
जिस तरह से पुराने जमाने में डार्क रूम में केमिकल से नेगेटिव धोकर फोटो निकाले जाते थे, ठीक उसी तरह से इस डेंटल कॉलेज में एक्स-रे के प्रिंट निकाले जाते रहे हैं। इस तकनीक से एक्स-रे निकालने से मरीजों को ज्यादा रेडिएशन से नुकसान का खतरा तो रहता ही है। साथ ही एक्स-रे की गुणवत्ता भी सही नहीं रहती।

फिल्में धोने में इस्तेमाल होने वाला केमिकल भी पर्यावरण के लिए खतरनाक होता है। अब मशीनें खराब पड़ी होने से इस तरह के एक्स-रे भी नहीं निकल पा रहे हैं। आरवीजी यानी रेडियो विजुवल ग्राफि क्स से जहां रेडिएशन का खतरा कम हो जाता है, वहीं इसके परिणाम भी सही आते हैं।     

रोजाना अस्पताल पहुंचते हैं 250 मरीज  
डेंटल कॉलेज में अपना इलाज करवाने के लिए रोजाना करीब 250 मरीज पहुंचते हैं। इनमें दांतों के सामान्य इलाज के लिए तो लोग आते ही हैं। साथ में दुर्घटना के बाद जिनके जबड़ों या दांतों को चोटें पहुंचती हैं, वे भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

एक्स-रे नहीं कर पाने के कारण इन्हें चंडीगढ़ से ही एक्स-रे करवाने पड़ रहे हैं। इस अस्पताल में इंडोर मरीजों के लिए 20 बेडों की व्यवस्था की गई है। इनके भी एक्स-रे करने हों तो चंडीगढ़ से करवाने पड़ते हैं।   

मेडिको-लीगल केस में भी नहीं दी जा पा रही राय 
इस अस्पताल में पुलिस की ओर से लाए जाने वाले मेडिको-लीगल मामलोें में भी राय नहीं दी जा पा रही है। इनमें कई बार मृतकों की आयु निर्धारण के लिए उनके जबड़े लाए जाते हैं, जिनके एक्स-रे नहीं हो पाते हैं। मासूम युग गुप्ता की हत्या के बाद उसके जबडे़ का यहीं पर एक्स-रे निकाला गया।  

पीजी विद्यार्थियों को भी जाना पड़ रहा पीजीआई 
कॉलेज में करीब सात विषयों में पीजी होती है। करीब 50 से ज्यादा यहां पीजी विद्यार्थी हैं, मगर डिजिटल एक्स-रे के लिए उन्हें भी पीजीआई चंडीगढ़ जाना पड़ रहा है। तभी उनके शोध कार्य पूरे हो पाते हैं। 

डिजिटल एक्स-रे खरीदने का प्रावधान किया 
स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर ने कहा है कि डिजिटल एक्स-रे खरीदने के लिए सरकार ने प्रावधान किया है। अब तक नई तकनीक के एक्स-रे क्यों नहीं आ पाए हैं, ये देखना होगा। इसकी प्रक्रिया में वक्त लगता है। 

पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डा. राजीव बिंदल ने कहा कि हमारे वक्त में जहां दंत महाविद्यालय शिमला की मशीनरी ठीकठाक थी, वहीं हमने इस कॉलेज के लिए 25 नई सीटें लाईं। ये वर्तमान कांग्रेस सरकार की नाकामी है। मेडिकल कॉलेजों में किसी भी तरह की लापरवाही गलत है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें