ये है पूरा मामला
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता वर्ष 1990 (अप्रैल और मई) में हिमाचल प्रदेश वन सेवा में शामिल हुए थे। राज्य सरकार ने 8 विशिष्ट श्रेणियों के लिए 27 अगस्त 2009 से सांकेतिक और 9 अगस्त 2012 से वास्तविक आधार पर चार स्तरीय वेतन ढांचा बहाल किया था।एचपीएफसी श्रेणी के लिए यह लाभ 26 अगस्त 2013 के निर्देश से 1 सितंबर 2013 (वास्तविक आधार) से लागू किया गया, लेकिन 2009 से सांकेतिक लाभ देने से मना कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें एचपीएएस अधिकारियों के समान 27 अगस्त 2009 से सांकेतिक लाभ न देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। राज्य सरकार ने दलील दी थी कि एसपीएफएस और एचपीएएस में कोई समानता नहीं है। न्यायालय ने पाया कि एचपीएएस और आईएफएस अधिकारियों को अक्सर उन पदों पर तैनात किया जाता है जो आमतौर पर एचपीएएस और आईएफएस अधिकारियों की ओर से संभाले जाते हैं। अदालत ने कहा कि यद्यपि वेतनमान तय करना कार्यपालिका का अधिकार है, लेकिन यदि सरकार का वर्गीकरण मनमाना या भेदभावपूर्ण हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
मुख्य विवाद सुलझने के बाद लेबर कोर्ट के आदेश बेअसर
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने औद्योगिक विवाद कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि लेबर कोर्ट या ट्रिब्यूनल के समक्ष चल रहे मुख्य विवाद (रेफरेंस) का अंतिम फैसला आ जाता है, तो विवाद के दौरान धारा 33-ए में दिए गए अस्थायी आदेशों का प्रभाव अपने आप खत्म हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एचएफसीएल लिमिटेड बनाम रितु कुमारी और अन्य 32 अपीलों) का निपटारा करते हुए एकल जज के फैसले को सही ठहराया। गौरतलब है कि काम नुकसान में चलने के कारण सोलन में एचएफसीएल कंपनी ने अपना प्लांट हैदराबाद शिफ्ट करने और कर्मचारियों को दूसरी जगहों (जैसे रांची) ट्रांसफर करने का नोटिस जारी किया था। उस समय लेबर कोर्ट में कंपनी और कर्मचारियों के बीच मुख्य विवाद पहले से चल रहा था। कर्मचारियों ने तबादला आदेशों (4 सितंबर 2020) के खिलाफ लेबर कोर्ट में धारा 33-ए के तहत शिकायत दर्ज कराई कि केस पेंडिंग रहते बिना अनुमति ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। लेबर कोर्ट ने एक अक्तूबर 2022 को कर्मचारियों के ट्रांसफर ऑर्डर रद्द कर दिए। इसके तुरंत बाद एक नवंबर 2022 को लेबर कोर्ट ने मुख्य विवाद का भी अंतिम फैसला सुना दिया। इसके बाद एकल जज ने कंपनी की याचिकाओं को यह कहते हुए निपटा दिया कि मुख्य केस खत्म होने के बाद अब धारा 33-ए के आदेश की कोई अहमियत नहीं रह गई है। अदालत ने कहा कि धारा 33-ए में कर्मचारियों को मिलने वाली राहत तभी तक प्रभावी रहती है जब तक मुख्य विवाद कोर्ट में पेंडिंग हो। अदालत ने कंपनी के इस तर्क को खारिज कर दिया गया कि याचिकाएं खारिज होने से उसका नुकसान हुआ है।
रजनी देवी के पक्ष में सरकार ने लागू किया हाईकोर्ट का फैसला
हिमाचल प्रदेश सरकार ने रजनी देवी को पीटीए अनुदान, सहायता देने का फैसला किया है। यह कार्रवाई प्रदेश हाईकोर्ट के 20 मई 2026 के आदेश और कानून विभाग की राय के बाद की गई है। शिक्षा विभाग ने स्कूल शिक्षा निदेशक को मामले में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। रजनी देवी को उनकी पात्रता अवधि की बकाया अनुदान-सहायता भी दी जाएगी। वह एक जून 2010 को एसएमसी आधार पर नियुक्त हुईं। उन्हें अगस्त 2014 से एसएमसी अनुदान-सहायता मिल रही थी, लेकिन अब जनवरी 2008 से जुलाई 2014 तक की अवधि के लिए भी देय लाभ देने की प्रक्रिया शुरू की गई है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि रजनी देवी की नियुक्ति को वैध नहीं ठहराया जा रहा है, लेकिन नियमों के अनुसार उन्हें पीटीए नीति के तहत मिलने वाली अनुदान-सहायता का भुगतान किया जाना चाहिए। विभाग ने सुशील कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि समान परिस्थितियों में लाभ दिए गए हैं, इसलिए रजनी देवी को इससे वंचित नहीं रखा जा सकता।