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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026: चार या पांच सितंबर? बन रहा विशेष संयोग, फटाफट जानें किस रात मनेगा कान्हा का जन्मदिन

Mon, 31 Aug 2026 04:45 PM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। इस बार अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और हर्षण योग का विशेष संयोग बन रहा है। भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव और विशेष पूजा के लिए रात 11:57 से 12:43 बजे तक 46 मिनट का शुभ मुहूर्त रहेगा। मध्यरात्रि में बाल गोपाल का पंचामृत अभिषेक, श्रृंगार, आरती और भोग लगाया जाएगा। मंदिरों में भजन-कीर्तन, जागरण और धार्मिक पाठ भी होंगे। पढ़ें पूरी खबर...

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कृष्ण जन्माष्टमी 2026 - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर इस बार लोगों के बीच तारीख को लेकर असमंजस बना हुआ है। कहीं 4 सितंबर तो कहीं 5 सितंबर को जन्माष्टमी मनाए जाने की जानकारी सामने आ रही है। हालांकि सामान्य गृहस्थ परंपरा और उत्तर भारत के पंचांग के अनुसार शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। खास बात यह है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व रहेगा।

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भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के दौरान हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी के निर्धारण में सिर्फ तारीख नहीं बल्कि तिथि, नक्षत्र और मध्यरात्रि के समय को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वजह से अलग-अलग परंपराओं में तारीख को लेकर अंतर दिखाई देता है।

4 सितंबर की रात होगा कान्हा का जन्मोत्सव
पंचांग गणना के अनुसार 4 सितंबर को अष्टमी तिथि शुरू होकर 5 सितंबर की मध्यरात्रि के आसपास समाप्त होगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र भी 4 सितंबर को रहेगा। ऐसे में 4 सितंबर की रात भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के लिए विशेष मानी जा रही है।

शिमला के गंज बाजार स्थित राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी उमेश नौटियाल के अनुसार, रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक जन्मोत्सव और विशेष पूजन का शुभ समय रहेगा। करीब 46 मिनट की इस अवधि में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक, पूजन और आरती कर सकते हैं।

रोहिणी नक्षत्र को क्यों माना जाता है खास?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी की पूजा में रोहिणी नक्षत्र को विशेष महत्व दिया जाता है। हालांकि हर वर्ष अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग एक ही समय पर बने, यह जरूरी नहीं है। यही वजह है कि कई बार जन्माष्टमी की तारीख को लेकर अलग-अलग मत सामने आते हैं।

4 और 5 सितंबर का भ्रम क्यों?
इस बार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र की स्थिति ऐसी है कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में पर्व मनाने के दिन में अंतर दिखाई दे रहा है। अधिकांश गृहस्थ श्रद्धालु 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाएंगे, जबकि कुछ वैष्णव परंपराओं और संस्थानों में 5 सितंबर को भी उत्सव मनाया जा सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं के लिए अपने स्थानीय मंदिर और मान्य पंचांग के अनुसार पूजा की तारीख तय करना बेहतर रहेगा।

आधी रात में होगा बाल गोपाल का अभिषेक
जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु सुबह से व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा करते हैं। मध्यरात्रि में जन्मोत्सव के समय बाल गोपाल को पंचामृत से स्नान कराया जाता है। इसके बाद नए वस्त्र पहनाकर उनका श्रृंगार किया जाता है और माखन-मिश्री, खीर, पंजीरी तथा अन्य प्रसाद का भोग लगाया जाता है। कई मंदिरों में जन्म के समय शंख और घंटियों की ध्वनि के साथ आरती होती है। इसके बाद भगवान कृष्ण को झूले में विराजमान कर श्रद्धालु झूला सेवा करते हैं।
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रातभर गूंजेंगे भजन और कृष्ण नाम
जन्माष्टमी पर मंदिरों में भजन-कीर्तन, जागरण और धार्मिक पाठ का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' और हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग का पाठ भी किया जाता है। इस बार जन्माष्टमी की सबसे खास बात 4 सितंबर की रात का 46 मिनट का विशेष पूजन समय है। यही वह अवधि है जब श्रद्धालु मध्यरात्रि में कान्हा के जन्म का उत्सव श्रद्धा और विधि-विधान के साथ मना सकेंगे।
 
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