पांवटा विधानसभा क्षेत्र का एक प्राइमरी स्कूल आज भी घास की झोपड़ी में चलता है। सरकार की ओर से शिक्षा क्षेत्र में अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद प्राथमिक पाठशाला जंबू खाला के छात्र 18 वर्षों से घास की झोपड़ी में पढ़ने को मजबूर हैं। कई बार दिन के समय जंगली जानवर स्कूल में आ धमकते हैं।
अजोली पंचायत के अंतर्गत प्राथमिक पाठशाला जंबू खाला 1996 से घास की झोपड़ी में चल रही है। झोपड़ी की हालत इतनी बदतर हो गई है कि स्कूल स्टाफ के लिए सरकारी रिकॉर्ड बचाना भी चुनौती बना हुआ है। स्टाफ ने अपने पैसे से झोपड़ी के ऊपर तिरपाल डाली है। झोपड़ी इतनी छोटी है कि पूरे साल कक्षाएं खुले आसमान के नीचे लगती हैं। बारिश होने पर बच्चों की छुट्टी हो जाती है। अंदर स्कूल का सामान ठूंस-ठूस कर भरा है। एक से पांचवीं तक गुज्जर समुदाय के 27 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
स्कूल प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष युसुफ अली के अलावा सदस्य भूरा खान, हुस्न बीबी, नूर मोहम्मद आदि ने बताया कि ग्रामीण स्कूल भवन की समस्या को लेकर विधायक से लेकर सरकारी अधिकारियों से भी गुहार लगा चुके हैं। नन्हें बच्चे आधुनिक शिक्षा तो छोड़िए, बेसिक शिक्षा से भी महरूम हैं। स्कूल प्रभारी जगत सिंह तोमर एवं महिला शिक्षक विजया भट्ट ने बताया कि स्कूल पहुंचने के लिए तीन किलोमीटर सुनसान जंगल का रास्ता है। फिर झोपड़ी में चल रहा स्कूल भी सुरक्षित नहीं है।
रिजर्व फॉरेस्ट के कारण नहीं बना भवन
जंबू खाले के आसपास की पूरी जमीन आरक्षित वन क्षेत्र (रिजर्व फॉरेस्ट) में होने से भवन नहीं बन पा रहा है। झोपड़ी की चहारदीवारी कच्ची मिट्टी से बनाई गई है। यह बरसात में कभी भी गिर सकती है। छत में बांस के डंडों पर लंबी घास बिछाई है। स्कूल पांवटा-शिलाई-लालढांग एनएच 72बी अजोली से तीन किलोमीटर की दूरी पर है।
जंबू खाना स्कूल के आसपास की जमीन रिजर्व फॉरेस्ट की होने से यह शिक्षा विभाग को नहीं मिल रही है। भवन के लिए कई बार बजट आया है। स्कूल की रसोई शेड को 70 हजार और शौचालय के लिए 30 हजार का बजट आया है, लेकिन भूमि का प्रावधान न होने से मिला बजट भी कुछ समय बाद लैप्स हो जाएगा। शिक्षा विभाग के सभी बड़े अधिकारियों को इस बारे में जानकारी है।
- सुमन गुप्ता, बीपीईओ पांवटा
पढ़ने वाले बच्चे तीन, पढ़ाने वाले पांच
स्कूलों में कहीं शिक्षक नहीं तो कहीं बच्चे। कई स्कूल ऐसे हैं जहां दो से तीन बच्चों पर चार से पांच स्टाफ है तो कहीं दर्जनों बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक पूरे नहीं। सरकारी तंत्र की पोल कई स्कूलों में खुल रही है। 1981 से चल रहे शड़ियाणा के सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के लिए बच्चे नहीं मिल रहे। यहां पढ़ने वाले बच्चे तीन हैं तो पढ़ाने वाले एक मुख्य अध्यापक, एक शिक्षक और देखरेख के लिए दो गैर शिक्षक कर्मचारी तैनात हैं।
मैली स्कूल में महज दो बच्चे हैं। 42 स्कूल ऐसे हैं, जहां 10 या 10 से भी कम बच्चे हैं। शड़ियाणा पंचायत के उप प्रधान कर्ण ठाकुर, राजकुमार, कपिल कुमार, प्रदीप कुमार व नरेश कुमार ने कहा कि स्कूल में बच्चे नहीं हैं। महज तीन नौनिहालों के लिए स्कूल चल रहा है। सरकार को शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। सरकारी स्कूलों में निजी स्कूलों की तरह गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पहल करनी चाहिए।
42 स्कूलों में 10 या इससे भी कम बच्चे
बीईईओ धर्मपुर माया देवी ने कहा कि लोगों को सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराना चाहिए। एसएमसी की ओर से कई सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी विषय को शुरू किया जा चुका है। शिक्षा विभाग साक्षरता स्तर बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। अभिभावकों को भी शिक्षा विभाग का सहयोग करना चाहिए।
क्यार-09, गढियार-10, शडयाना- 03, गारा-08, डांगरी- 09, खरोल -10, अलोबरा- 08, कठारी - 08, कैथा- 08, जौल- 09, रौड़ी- 07, बोढ़ती-10, खारटू -10, धार- 08, सुजाइला-06, ब्यूली- 03 चलैली-10, प्लाड़ी-08, कोटू -07, आजौर- 09, शमलेटा - 04, झुंडला- 06, बैहमो- 08, शहनाली -09, बोहली-08, ननिहास-08, मटरेच-07, गैरू-06, कश्माड़ी-07, छाजा-07, शिलाई-07, चैवला -09, मैली- 02, झकडयूं-06, बोहीरा-04, सैंज-09, टैमो-09, मामला-07, ठियोड़ा-09, ब्लासी- 07, गड्डी-08, बाडउाडा-09, कासला -09, झीडा- 10, कभनयोला-08, स्केडी- 10, कपलाड़ा-10.