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HPU Shimla: यूजी खराब परीक्षा परिणाम मामला, पर्यावरण विज्ञान विषय में फेल हुए अधिकतर छात्र, जानें वजह

Mon, 28 Nov 2022 11:53 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

यूजी प्रथम वर्ष के खराब रहे नतीजों पर हुए बवाल के बाद बेशक कमेटी ने इसके कारणों का पता लगाने की जांच शुरू कर दी है। मगर खराब नतीजों के लिए व्यवस्थागत खामियां और कॉलेजों में शिक्षकों, आवश्यक संसाधनों की कमी भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है।
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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के यूजी प्रथम वर्ष के खराब रहे नतीजों पर हुए बवाल के बाद बेशक कमेटी ने इसके कारणों का पता लगाने की जांच शुरू कर दी है। मगर खराब नतीजों के लिए व्यवस्थागत खामियां और कॉलेजों में शिक्षकों, आवश्यक संसाधनों की कमी भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। 2013 में लागू किए गए रूसा सीबीसीएस के साथ ही यूजी के सभी संकायों में पर्यावरण विज्ञान विषय शुरू जरूर किया गया, मगर आज तक किसी भी कॉलेज में इस विषय को पढ़ाने के लिए शिक्षक की नियुक्ति नहीं हुई है। यूजी प्रथम वर्ष के घोषित परिणामों में इसी विषय में अधिकतर छात्र फेल हुए हैं। 

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डिग्री लेने के लिए इस विषय में पास होना जरूरी किया गया है। शिक्षा विभाग, विवि ने इस विषय को पढ़ाने के लिए कॉलेज में शिक्षक तक की व्यवस्था नहीं की। यह सब कॉलेजों पर छोड़ रखा है कि बिना शिक्षक वे इस ईवीएस (पर्यावरण विज्ञान) विषय को पढ़ाएं, विवि सिर्फ उसे चेक करने की व्यवस्था देखेगा। सवाल यह है कि जब कॉलेजों में इस विषय को पढ़ाने वाला शिक्षक ही नहीं है, तो इस विषय की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन विवि किससे करवाता आ रहा है। इस आवश्यक विषय के लिए शिक्षक का न होना और इसे गंभीरता से न लिया जाना भी छात्रों के इस विषय में फेल होने की वजह है। 

हैरत इस बात की है कि प्रदेश के कुल करीब 144 डिग्री कॉलेजों में से 97 में प्राचार्य के पद खाली हैं। 37 पदों पर रेगुलर प्राचार्य तैनात हैं, जबकि 16 में अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे हैं। जिला मुख्यालयों के कॉलेजों के अलावा अन्य कॉलेजों में आवश्यक विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों भी सैकड़ों पद रिक्त चल रहे हैं। अच्छे परिणाम के लिए कॉलेजों में ढांचागत सुविधाओं के साथ शिक्षक और कक्षाओं की व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए मुखिया की नियुक्ति होना जरूरी होता है। 
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राजकीय प्राध्यापक संघ ने भी उठाए सवाल
राजकीय प्राध्यापक संघ ने कहा कि उत्तर पुस्तिकाएं जांचने में ऑन स्क्रीन मूल्यांकन की प्रक्रिया बिना तैयारी, बिना प्रशिक्षण प्रथम वर्ष में शिक्षकों की राय लिए बिना लागू कर दी गई। पुस्तिकाओं को जांचने का कार्य करवाने के लिए किस तरह से इसकी मानीटरिंग हुई, इसकी कॉलेजों के प्राचार्यों तक को जानकारी नहीं थी। संघ के अध्यक्ष डॉ. धर्मवीर और महासचिव डॉ. राम लाल ने माना कि ईवीएस पढ़ाने को पूरे प्रदेश में एक भी शिक्षक तैनात नहीं किया गया। जबकि इस विषय को पास करना जरूरी होता है। अधिकतर छात्र इस विषय में फेल हैं। जरूरी विषयों को पढ़ाने को कॉलेजों में शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। इन सब समस्याओं को भी ध्यान में रखा जाए। प्राचार्यों और शिक्षकों को भी जांच में पक्ष रखने का मौका मिले। 

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दिव्यांग छात्रा को एमबीबीएस में प्रवेश  देने से इनकार की राज्यपाल से शिकायत 

छात्रा निकिता चौधरी को उसकी दिव्यांगता के कारण डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज टांडा ने एमबीबीएस में प्रवेश देने से इनकार कर दिया है। उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष और राज्य विकलांगता सलाहकार बोर्ड के विशेषज्ञ सदस्य प्रो. अजय श्रीवास्तव ने राज्यपाल को पत्र लिखकर निकिता को न्याय दिलाने की मांग की है। प्रो. अजय श्रीवास्तव ने बताया कि कांगड़ा जिले की तहसील बड़ोह के गांव सरोत्री की निकिता चौधरी ने इस वर्ष नीट पास किया। वह विकलांगता के कारण व्हील चेयर यूजर हैं। कांगड़ा के मेडिकल बोर्ड ने 75 प्रतिशत विकलांगता का प्रमाण पत्र दिया गया है। मेरिट के आधार पर राज्य कोटे की एमबीबीएस की सीट टांडा मेडिकल कॉलेज में मिलनी थी।

नीट की शर्तों के अनुसार ऐसे उम्मीदवारों को मेडिकल बोर्ड से विकलांगता का प्रमाणीकरण करवाना आवश्यक है। चंडीगढ़ के सेक्टर -32 का राजकीय मेडिकल कॉलेज को इसके लिए नीट ने अधिकृत किया गया था। निकिता ने वहां से विकलांगता का प्रमाण पत्र लिया जो 78 प्रतिशत का है। नीट के नियमों के अनुसार 80 प्रतिशत तक विकलांगता वाले युवा एमबीबीएस में प्रवेश के पात्र हैं। इस आधार पर उसका प्रवेश टांडा मेडिकल कॉलेज में हो जाना चाहिए था। उन्होंने बताया कि टांडा मेडिकल कॉलेज ने नीट के नियमों के विपरीत जाकर उसका दोबारा मेडिकल कराया और प्रमाणपत्र में उसकी विकलांगता 90 प्रतिशत कर दी। वहां उससे यह भी कहा गया कि वह पढ़ाई के दौरान व्हील चेयर से कैसे चल पाओगी। प्रो. श्रीवास्तव ने राज्यपाल को बताया कि अटल मेडिकल यूनिवर्सिटी और टांडा मेडिकल कॉलेज की ओर से दोबारा उसका मेडिकल किया जाना बिल्कुल गैरकानूनी है। 
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