देश भर में रावण दहन विजयादशमी के दिन होता है लेकिन कुल्लू में इसका आयोजन सात दिन बाद पूर्णिमा के आसपास किया जाता है। मान्यता है कि भगवान रघुनाथ ने लंका पर चढ़ाई से पहले नवरात्रों में नौ दिन दुर्गा की आराधना की। दसवें दिन लंका पर चढ़ाई की। युद्ध में रावण मारा गया लेकिन उसने अंतिम सांस पूर्णिमा के दिन ली। इसीलिए यहां पूर्णिमा के आसपास इस रस्म को निभाया जाता है।
उधर, सभी देवी-देवता लंका पर चढ़ाई से पूर्व अधिष्ठाता देव भगवान रघुनाथ के पास पहुंचते हैं। रघुनाथ के अस्थायी शिविर में रजिस्टर में बाकायदा देवताओं की हाजिरी लगती है। ऐसा इसलिए ताकि देवताओं को युद्ध में शामिल होने की मंजूरी मिल सके। भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार एवं स्थानीय विधायक महेश्वर सिंह ने बताया कि कुल्लू दशहरा वाल्मीकि रामायण के अनुसार मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि रावण ने अंतिम सांस पूर्णिमा के दिन ली।