उतर भारत का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव शुरू हो गया है। देवी-देवताओं के इस महाकुंभ में भाग लेने पहुंचे सैकड़ों देवी-देवताओं ने आराध्य देव भगवान रघुनाथ के मंदिर में शीश नवाजा।
सुबह आठ बजे से ही रघुनाथ मंदिर में देवी-देवताओं के पहुंचने का तांता लगा रहा। देव शक्ति से रघुनाथ के दरबार में झुकते देवरथों का नजारा देखते ही बन रहा था। रघुनाथ मंदिर में शीश नवाजने गए देवी-देवता राजा के महल गए।
यहां राज परिवार को आशीर्वाद देकर अपने-अपने अस्थायी शिविरों में लौटे आए। अश्व और शस्त्र पूजन के बाद भगवान रघुनाथ को सुल्तानपुर से पारंपरिक वाद्य यंत्रों की स्वर लहरियों के बीच दोपहर बाद रथ मैदान ढालपुर पहुंचाया गया।
जेवरात से सजकर आए देवता
इसे पहले भगवान रघुनाथ मंदिर में दशहरा उत्सव के पहले दिन सुबह से ही देवताओं का क्रम चलता रहा। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर देव खुडीजल, व्यास ऋषि, देव भुझारी कोट, शृंगाऋषि बालूनाग, बिजली महादेव तथा माता बूढ़ी नागिन सहित सैकड़ों देवी-देवता सोने-चांदी के आभूषणों से सुसज्जित देव रथों का नजारा देव लोक से कम नहीं लग रहा था।
मंदिर में शीश नवाजने के बाद पुरोहितों ने बाकायदा धागा और पगड़ी भी दी। उधर, राजाओं की दादी कही जाने वाली देवी हिडिंबा की मौजूदगी में अश्व और शस्त्र पूजन किया गया। यह अश्व भगवान रघुनाथ की जलेब में सबसे आगे चलता है।
महल में इस प्राचीन प्रथा का निर्वहन करने के पश्चात रघुनाथ मंदिर में विधिवत पूजा की गई और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर गूंज से ढालपुर मैदान तक शोभायात्रा निकाली गई। भगवान रघुनाथ की शोभायात्रा वाली परंपरागत गली को लोगों ने अपार श्रद्धा व्यक्त करते हुए फूलों की वर्षा से महका दिया।
देव समागम में पहुंचे शोधार्थी
देवी-देवताओं के महाकुंभ कहे जाने वाले दशहरा पर्व में देव संस्कृति और देव रथों पर शोध करने के लिए देश विदेश के दर्जनों शोधार्थी भी कुल्लू पहुंच गए हैं। ये लोग रघुनाथ की भव्य शोभायात्रा से लेकर इसके इतिहास और देव संस्कृति से जुडे़ कई अन्य पहलुओं पर अगले सात दिन तक शोध कार्य करेंगे।
इस दौरान जहां शोधकर्ता वीडियोग्राफी का कार्य करेंगे। वहीं, देव समाज से जुड़े लोगों के साथ इसके इतिहास की जानकारी भी प्राप्त करते हैं। शोध कार्य के लिए देश-विदेश के लोग भी पहुंचते हैं। इसमें विदेशों के अधिक लोग होते हैं।
दशहरा उत्सव समिति की ओर से हर वर्ष विदेशी कलाकारों को कार्यक्रम के लिए निमंत्रण भेजा जाता है। इस बार बारह देशों के विदेशी कलाकार कलाकेंद्र में अपनी प्रस्तुति देंगे। विदेशी पर्यटक कुल्लू की अनूठी देव संस्कृति को देखकर आश्चर्यचकित और आनंदित हो रहे हैं।