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नदी पार से ही दशहरा देखते हैं ये पांच देवता

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हिमाचल में देव महाकुंभ के नाम से विख्यात अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में कुछ देवताओं के शिरकत करने पर पाबंदी है। भले ही ये देवता दशहरा उत्सव के लिए अपने मूल स्थान से रवाना होते हैं।
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मगर लेकिन अठारह करडू़ की सोह (18 करोड़ देवी-देवताओं का स्थल) कहे जाने वाले ढालपुर में ये नहीं आते। ढालपुर मैदान पर चलने वाले दशहरा मेला को ये देवता दरिया पार से ही देखते हैं। ये परंपरा कई सालों से चलती आ रही है।

इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए इस बार भी इन देवताओं ने ब्यास के उस पार खराहल घाटी के डोभी में डेरा डाला है। कहा जाता है कि ये देवता अपनी मर्जी से भी इस मेले में शामिल नहीं होते। वहीं, कुछ ऐसे भी हैं जो मेले में उत्पात मचा सकते हैं। ऐसे में इनके आने पर या तो पाबंदी है या इन्हें नजरबंद रखा जाता है।
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मेले से दूर जमाया अपना डेरा

आनी, निरमंड, बंजार, मणिकर्ण, लगवैली और खराहल घाटी के सभी देवता ढालपुर के मैदान में पहुंचकर भगवान रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी भरते हैं। लेकिन कुछ देवता ऐसे भी हैं जो रघुनाथ जी के दरबार में नहीं आ सकते।

हालांकि ये देवता दरिया पार से ही दशहरा में शामिल होकर भगवान रघुनाथ से मिलन करते हैं। मलाणा के देवता ऋषि जमदग्नि, जाणा के देवता जीव नारायण, सौर के देवता सरवल नाग, तांदला के देवता शुक्री नाग और सोयल के देवता आजीमल खराहल घाटी के गांव डोभी में डेरा जमाए हुए हैं।

सभी देवता पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए ब्यास को पार नहीं करते। इसलिए भगवान रघुनाथ के सम्मान में सभी देवता दशहरे में दरिया पार से ही शामिल होते हैं। तांदला के देवता शुक्री नाग के पुजारी टिकम राम ने बताया कि सदियों पुराने नियम के अनुसार देवता ब्यास पार नहीं करते।
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तीसरे दिन निकली जलेब

दशहरा उत्सव के तीसरे दिन रविवार को नर सिंह की पारंपरिक जलेब पूरे लाव लश्कर के साथ निकली। ढालपुर स्थित चनणी से शुरू हुई जलेब में पांचवीर, अधिष्ठाता देव घटोत्कच सहित दर्जनभर देवी देवताओं ने हिस्सा लिया।

सोने-चांदी के सजे देव रथों और ढोल-नगाड़ों की थाप और शहनाई की स्वर लहरियों के बीच निकली भव्य जलेब आकर्षण का केंद्र रही। देवरथों के साथ चली जलेब में आगे नर सिंह की घोड़ी और पीछे दर्जन भर देव रथ और उनके साथ थिरकते सैकड़ों देवलुओं से पूरा वातावरण देवमय हो उठा।

इस दौरान राजा महेश्वर सिंह की पालकी ने पूरे ढालपुर शहर की परंपरानुसार परिक्रमा की। दर्जनों ढोल-नगाड़ों की थाप पर शुरू हुई जलेब ने देशी विदेशी सैलानियों में कौतुहल भर दिया। राजसी ठाठ के साथ निकली इस जलेब में देवलु जमकर नाचे। जलेब ने पूरे शहर में परिक्रमा की।
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