हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह अगर राजनीति में नहीं आते तो दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होते। प्रदेश में हुई कई जनसभाओं में लोगों से मन की बात में वीरभद्र सिंह यह खुलासा कर चुके हैं। वीरभद्र सिंह कहते थे कि उनका सपना था कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में प्रोफेसर बनें, लेकिन कांग्रेस की वरिष्ठ नेता रहीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर वह राजनीति में आए।
हिमाचल प्रदेश से लेकर देश की राजनीति में अपना सिक्का जमाने वाले वीरभद्र सिंह ने कभी अपनी जन्मभूमि रामपुर से आरक्षण व्यवस्था के चलते विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। इस क्षेत्र में उनका प्रभाव इतना था कि उन्होंने जिस भी प्रत्याशी को आशीर्वाद दिया, वह भारी मतों से जीता। हालांकि, वह प्रदेश के अकेले ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपनी जन्मभूमि से बाहर निकलकर बिना हार-जीत की चिंता किए अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी ताल ठोकी।
केंद्र की सियासत से जब उन्होंने हिमाचल की सियासी जमीन पर पैर रखा तो उन्हीं ठाकुर रामलाल की जुब्बल कोटखाई सीट से चुनाव लड़ा, जिन्हें हटाकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। 1985 में भी वह इसी सीट से चुनाव लड़े और जीते। हालांकि, इसके बाद 1990 में ठाकुर रामलाल प्रदेश की सियासत में वापस लौट आए और जुब्बल कोटखाई से ही चुनावी ताल ठोक दी।
रामलाल का गढ़ होने के बावजूद वीरभद्र सिंह ने हार-जीत के डर के बिना फिर इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ा और हार गए। हालांकि, इसी दौरान वह रामपुर से लगी दूसरी क्षेत्र रोहडू से चुनाव लड़े और रिकॉर्ड 26 हजार से ज्यादा मतों से जीते। रोहड़ू सीट से वह चार बार और विधायक बने। जब यह सीट आरक्षित हो गई तो 2012 में शिमला ग्रामीण विधानसभा सीट से विधायक बने। यह भी एक गैर परंपरागत सीट थी, जहां से वह पहली बार मैदान में उतरे थे।
नया क्षेत्र होने के बावजूद लोगों में वीरभद्र के प्रति इतना प्रेम रहा कि 2017 में जब उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह ने इस सीट पर अपनी सियासी पारी की शुरुआत की तो कथित भाजपा लहर के बावजूद लोगों ने उन्हें भारी मतों से जिता दिया। इसी दौरान वह खुद सोलन जिले के अर्की विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। भाजपा ने 2017 के चुनावों के दौरान उनको इस सीट पर हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।
उनका चुनावी प्रबंधन कहें या फिर सियासी कद, उस सीट से पहली बार चुनाव लड़ने के बावजूद वीरभद्र नामांकन के अलावा सिर्फ एक बार लोगों से मिलने गए, लेकिन लोगों ने उन्हें पांच हजार से ज्यादा मतों से जिता दिया। इस चुनावी जीत के बाद उनका कद इतना बढ़ गया कि उनके लिए यहां तक कहा जाने लगा कि वीरभद्र वाकई हिमाचल के राजा है और वह जिस सीट से भी चाहें लड़कर जीत सकते हैं।