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आईआईटी ने ईजाद की तकनीक, कोहरे से बनेगा पानी, सिंचाई और पीने के आएगा काम

Tue, 09 Oct 2018 12:58 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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कोहरे की परत से अब फसलें तबाह नहीं होगी। उल्टे कोहरे को पानी में बदलकर खेतों को सींचा जा सकेगा। यही नहीं पीने के लिए भी इस पानी का प्रयोग किया जा सकेगा। आईआईटी मंडी के विशेषज्ञों ने ड्रैगंस लिली हेड नामक सजावटी पौधे (ग्लैडियस डलेंजी) की पत्तियों की सतह की संरचना पर आधारित वाटर हार्वेस्टिंग सरफेस तैयार किया है।

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हालांकि, इस पौधे में कोहरे को पानी में बदलने के प्राकृतिक गुण हैं। लेकिन बिना पैटर्न वाले कंट्रोल सैंपल की तुलना में आईआईटी की ओर से तैयार पैटर्न युक्त सैंपल पर कोहरे से पानी हासिल की क्षमता 230 प्रतिशत बढ़ गई है। इस शोध का परिणाम फ्लोरा, एसीएस सस्टेनेबल केमिस्ट्री और इंजीनियरिंग एंड बायोमीट्रिक्स जर्नल में हाल ही में प्रकाशित हुआ है।

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बारीक संरचनाओं का किया अध्ययन

बेसिक साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर एवं आविष्कारक डॉ. वेंकट कृष्णन ने कहा कि हवा से पानी प्राप्त करने वाले पौधों के शरीर की बारीक संरचनाओं का अध्ययन किया गया है। समरूप संरचना तैयार कर ऐसे मैटीरियल का विकास किया है, जो कहीं अधिक पानी हासिल कर सकते हैं।

डॉ. वेंकट ने कहा कि दुनिया के सूखे और अर्ध-सूखे क्षेत्रों में भी ऐसे कई पौधे हैं जिनकी पत्तियां ओस और कोहरे से पानी प्राप्त करने में सक्षम हैं। यदि वे कर सकती हैं तो विज्ञान क्यों नहीं? इसी से प्रेरणा लेकर वाटर हार्वेस्टिंग सरफेस तैयार किया गया।  

सरफेस ऐसे करेगा काम 
बूंदों के लैपलेस प्रेशर और फाइबर समान हैंगिंग फिनॉमिना की वजह से ग्रास के लिए कोहरा जमा करना आसान हो जाता है। ग्रास के संरचनात्मक लक्षणों की समझ विकसित होने से वाटर हार्वेस्टिंग में सक्षम मैटीरियल का प्रारूप तैयार होता है। जो कोहरे को पानी में बदलता है।  

163 मिलियन लोगों को स्वच्छ पानी नहीं 
पानी और स्वच्छता पर कार्यरत लंदन आधारित गैर-आर्थिक लाभ संगठन वाटर एड के हाल के अध्ययन से यह सामने आया है कि 1.35 अरब लोगों के देश भारत की 12 प्रतिशत आबादी को स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं है।

इसलिए बढ़ती आबादी के पेयजल समाधान के लिए केवल नीति और जल उपयोग की आदत बदलने पर नहीं बल्कि प्रकृति से सीख कर वैज्ञानिक एवं तकनीकी इनोवेशन पर भी जोर देना होगा।
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