वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सरकार भविष्य को ध्यान में रखकर आगामी नीतियां तैयार कर सकती है। त्रिवार्षिक उतार-चढ़ाव (ट्रायनियल ऑसिलेशन) के परिवर्तनों के प्रमाण का नीति निर्माता, किसान, जल प्रबंधक आदि उपयोग कर पाएंगे। कृषि प्रधान देश होने के नाते भारत के लिए कमजोर और जोरदार मानसून का कृषि पैदावार और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए यह जरूरी है कि पैटर्न और परिवर्तन की गहरी समझ विकसित कर बेहतर योजना और प्रबंधन करें।
वर्तमान में यह है चुनौती
ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून भारत की जीवन रेखा है। हवा के सालाना चक्र के साथ बारिश का मजबूत चक्र भी यह प्रदान करती है। लेकिन मानसून की सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। हालांकि यह स्थायी परिघटना है जो हर वर्ष तय समय पर होती है। पर इससे सालाना बारिश थोड़े समय के लिए कम-ज्यादा होती है और इसके बारे में पूर्वानुमान कठिन रहा है। यह भारत के बड़ी चुनौती है।
इस तरह किया शोध
टीम ने 1901 से 2005 के दौरान 1260 महीनों के बारिश के डाटा का इस्तेमाल कर ट्रायनियल ऑसिलेशन के स्पेशियल डिस्ट्रिब्यूशन का परीक्षण किया। तय डाटा का अवलोकन कर उसके पावर स्पेक्ट्रम का विश्लेषण किया गया। भारत के 354 से अधिक ग्रिड के आधे से अधिक हिस्से में 95 प्रतिशत के साथ 2.85 वर्ष की पीरियडिसीटी (काल चक्र) थी। वहीं रिसर्च टीम ने डेटा का एक सहयोगी फ्रेमवर्क-आधारित साइम्युलेशन, जिसे कपल्ड मॉडल इंटरकंपैरिजन प्रोजेक्ट (सीएमआईपी) कहा जाता है, में आकलन किया है। आकलनों से पता चला कि यह उतार-चढ़ाव (ऑसिलेशन) वर्ष 2100 तक कमजोर होगा।