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धूमल-अनुराग के खिलाफ केस रद्द करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उठाए कई सवाल, अफसरों को क्यों छोड़ा ?

Wed, 14 Nov 2018 10:39 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल, सांसद अनुराग ठाकुर और अन्य के खिलाफ एचपीसीए मामले में दायर प्राथमिकियां निरस्त करने की याचिका मंजूर करते हुए इसकी जांच पर कई सवाल खड़े किए हैं।
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कोर्ट ने अभियोजन पक्ष पर टिप्पणी करते हुए सवाल उठाए कि पूर्व आईएएस अधिकारी सुभाष आहलूवालिया और टीजी नेगी की संबंधित फैसलों में सक्रिय भूमिका रही, मगर उन पर जानबूझकर मुकदमे नहीं चलाए गए और उनकी सीएम कार्यालय में नियुक्ति कर दी गई।
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छह बड़े अधिकारियों में से किसी पर भी मुकदमा नहीं चला। छोटे अधिकारियों को ही बलि का बकरा बनाया। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि प्रार्थियों के खिलाफ ठगी, जालसाजी और क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट का कोई केस नहीं बनाया जा सका।

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सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कई प्रश्न उठाते हुए स्पष्ट किया कि धूमल, अनुराग तथा अन्य के खिलाफ दो एफआईआर (12/13 और 14/13) निरस्त करने की एचपीसीए की और अन्य याचिका को मंजूर किया। कोर्ट ने कहा कि क्रिकेट मैदान का अभाव होने पर इसके लिए न्यूनतम किराये पर जमीन लीज पर दी गई जो हिमाचल के लिए गर्व का विषय होना था।
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बाकी क्लब हाउस और होटल के लिए लीज रूल्स 2011 के अनुसार लीज मनी वाणिज्यिक दरों पर तय की गई। मुश्किल से इसमें कोई अपराध का तत्व रहा है। बड़े अफसरों में से आरएस गुप्ता और दीपक सानन को ही संलिप्त बताया। निर्णय लेने वालों में छह वरिष्ठ अधिकारियों में से चार आईएएस और एक एचएएस अफसर शामिल थे।
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आईएएस अधिकारी सुभाष आहलूवालिया जो निदेशक एवं विशेष सचिव युवा सेवाएं एवं खेल थे, उनके खिलाफ आरोप यह थे कि उन्होंने नियमों की उपेक्षा की और लीज रूल्स 1993 के प्रावधानों का उन्होंने उल्लेख नहीं किया। वह भी 29 जुलाई 2002 को लीज डीड में सिग्नेटरी थे।
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टीजी नेगी खेल सचिव थे। मामले में केवल पीडब्ल्यूडी के एक्सईएन देवीचंद चौहान ही अकेले बच गए थे। इससे यह प्रतीत होता है कि उच्च अधिकारियों को जानबूझकर छोड़ा गया। इससे आवेदक के मुकदमा चलाने के लांछन वाले उद्देश्य की पुष्टि होती है।
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आवेदक  एचपीसीए और अन्य की ओर से कोई आपराधिक कार्य नहीं हुआ। उपलब्ध तथ्य अपराध की पुष्टि नहीं करते। आवेदनकर्ता एचपीसीए एवं अन्य ने 150 करोड़ रुपये की संपत्ति का निर्माण किया है, जो लोगों के इस्तेमाल के लिए है। सरकार ही इसकी मालिक है।
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