हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वाहन दुर्घटना में आश्रितों को 8.32 लाख रुपये का मुआवजा अदा करने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश सत्येन वैद्य ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत आयुक्त के निर्णय में संशोधन किया है। आयुक्त ने आश्रितों को 16.64 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश दिए थे। रामपुर निवासी शकुंतला देवी और अन्य ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत आयुक्त के पास मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। दलील दी गई थी कि उसका पति ट्रक में बतौर चालक था।
ट्रक मालिक के आदेशों पर वह ट्रक चलाता था। नौकरी के दौरान वाहन दुर्घटना में उसकी मौत हो गई थी। दलील दी गई कि वह प्रतिमाह पांच हजार रुपये कमाता था। याचिकाकर्ता और उसके बच्चे मृतक की आय पर ही निर्भर थे। कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत आयुक्त ने आश्रितों को 16.64 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश दिए थे। इंश्योरेंस कंपनी ने इस निर्णय को अपील के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आयुक्त के निर्णय में संशोधन किया है।
वन भूमि पर बनाए गए बिजली प्रोजेक्ट पर एनजीटी ने लिया संज्ञान
उधर, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने करसोग के थुनाग में वन भूमि पर बनाए गए बिजली प्रोजेक्ट पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायिक सदस्य अरुण कुमार त्यागी और सदस्य अफरोज अहमद ने इसकी जांच के लिए संयुक्त कमेटी का गठन किया है। प्रदेश के मुख्य वन अरण्यपाल, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और डीसी मंडी को इस कमेटी का सदस्य बनाया गया है। ट्रिब्यूनल ने कमेटी को आदेश दिए कि वह इस मामले की जांच करे और अपनी अनुपालना रिपोर्ट ई-मेल के माध्यम से 11 अक्तूबर तक ट्रिब्यूनल को भेजे। थुनाग तहसील के सुराह गांववासियों की ओर से लिखे पत्र पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने संज्ञान लिया है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि सुराह गांव में 1.5 मेगावाट बिजली प्रोजेक्ट को वन भूमि का स्थानांतरण अवैध तरीके से किया गया है।
प्रोजेक्ट कंपनी पर आरोप लगाया गया है कि गांववासियों के झूठे हस्ताक्षर कर वन भूमि के स्थानांतरण के लिए आवेदन किया गया है। इसकी शिकायत स्थानीय प्रशासन से की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह भी आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने प्रोजेक्ट के लिए अतिरिक्त वन भूमि के लिए आवेदन किया है। इस पर उपमंडलाधिकारी थुनाग ने बिना क्षेत्राधिकार के वन भूमि का चयन किया है। ट्रिब्यूनल ने पाया कि पत्र में लगाए गए आरोप गंभीर है। इसकी जांच और रोकथाम जरूरी है। ट्रिब्यूनल ने कमेटी को आदेश दिए कि वह याचिकाकर्ता के आरोपों की जांच करे और इसके रोकथाम के लिए कानूनी तौर पर आवश्यक कदम उठाएं।