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#हिंदीहैंहम: पुलिस-राजस्व विभाग में उर्दू और फारसी के बजाय हिंदी में हो कामकाज

Fri, 20 Aug 2021 10:30 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, शिमला

सार

आजादी के 75 साल बाद भी हिंदी भाषा को उचित मान-सम्मान न मिलने पर इन साहित्य सेवियों में पीड़ा नजर आई, तो उन्होंने मुक्त कंठ से हिंदी के उत्थान के लिए कई सुझाव भी दिए। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश:
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हिमाचल के युवा साहित्यकार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमर उजाला ने अपने महत्वाकांक्षी अभियान ‘हिंदी हैं हम’ में शुक्रवार को शिमला कार्यालय से वेबिनार करवाया। इसमें हिमाचल प्रदेश के युवा साहित्यकारों से संवाद किया गया। इसमें युवा लेखकों और कवियों ने खूब उत्साह से भाग लिया। प्रतिभागियों ने अमर उजाला के इस अभियान की प्रशंसा करते हुए हिंदी भाषा की दशा और दिशा पर विचार रखे। आजादी के 75 साल बाद भी हिंदी भाषा को उचित मान-सम्मान न मिलने पर इन साहित्य सेवियों में पीड़ा नजर आई, तो उन्होंने मुक्त कंठ से हिंदी के उत्थान के लिए कई सुझाव भी दिए। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश :

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युवा कवि गोविंद गौरव ने कहा कि वह अमर उजाला के बहुत पुराने पाठक हैं। अमर उजाला को पढ़कर ही उन्हें लिखने की प्रेरणा मिली। हिंदी भाषा कई सोपानों से होकर गुजरी है। उन्होंने एक कविता की पंक्तियां पढ़ीं - मुखमंडल पर जिसके फैली निराशा है। राष्ट्रीय बनने की चिर काल से अभिलाषा है/ जो हृदय भाव को सही रूप दे सकती है। संपूर्ण जगत में मात्र हिंदी ऐसी भाषा है।

युवा कवि प्रदीप शर्मा ने कहा कि डॉ. बुल्के के शब्दों में अगर संस्कृत मां है तो हिंदी बहुरानी है और अंग्रेजी नौकरानी है। हिंदी को बहुरानी का सम्मान मिलना चाहिए। हिंदी भाषा में बेहतरीन साहित्य रचनाएं हुई हैं। इसे व्यवहार की भाषा बनाए जाने की भी जरूरत है। अमर उजाला के इस अभियान का हिस्सा बनकर वह गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। ऐसे अभियान आगे भी जारी रखें। 
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युवा साहित्य सेवी रूपेश कुमार ने कहा कि हिंदी ज्ञान की भाषा है। उन्होंने हनुमान चालीसा की पंक्ति का उल्लेख कर कहा कि जुग सहस्र जोजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू में पृथ्वी से सूरज तक की दूरी बता दी गई है। यह बड़ी अजीब बात है कि आज आजादी के 75 साल बाद भी हमें हिंदी भाषा की दशा और दिशा पर चिंतन करना पड़ रहा है। नई पीढ़ी को देवनागरी में गिनती नहीं आती। 

भाषा अध्यापक और गीतकार नरेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि अगर यह कहा जाए कि हिंदी भाषा राजनीति की भेंट चढ़ गई है तो ऐसा कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी। हिंदी को वह सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए। यह भाषा तो खुद की ताकत से ही नदी की तरह प्रवाहमान है। हिंदी भाषा ने तदभव, तत्सम आदि शब्दों से अपने भंडार को मजबूत किया है। बाधाओं के बावजूद इसका प्रवाह अनवरत रहेगा।

युवा साहित्यकार अनिल महंत ने कहा कि हम अभी भी हिंदी के सम्मान की बात कर रहे हैं। स्वतंत्रता के 75 वर्षों के बाद भी हिंदी को तरजीह देने की अपेक्षा कर रहे हैं। हिंदी के विकास के लिए सोशल मीडिया बहुत अच्छा मंच है। हमें हिंदी को सोशल मीडिया पर भी बढ़ावा देना चाहिए। इसे रोजगार की भाषा बनाया जाना चाहिए। अमर उजाला का यह अभियान प्रशंसनीय है। ऐसे अभियान चलते रहने चाहिए।

युवा कवि कौशल मुंगटा ने कहा कि वर्ष 1949 में हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया, मगर इसे मन से नहीं अपनाया गया। अगर सरकारी कामकाज की बात करें तो केवल दस फीसदी काम ही हिंदी में होता है। हिंदी से हिंदुस्तान की पहचान है। सरकार निजी स्कूलों को खोलने के गलते फैसले धड़ाधड़ ले रही है। भाषा विभाग, अकादमी कांग्रेस और भाजपा की बात करने के बजाय हिंदी भाषा पर ध्यान दे।

युवा साहित्य प्रेमी भूपाल सिंह ने कहा कि हम अंग्रेजों से तो आजाद हो गए, मगर अंग्रेजी से आज तक आजाद नहीं हुए। हम हिंदी भाषा को कैरियर, व्यवसाय और व्यवहार में नहीं ला पाए। जब तक हिंदी भाषा व्यावहारिक नहीं बनेगी, तब तक कुछ नहीं हो पाएगा। महात्मा गांधी खुद हिंदी भाषा को बहुत बढ़ावा देते थे। मगर आज आजादी के इतने वक्त के बाद भी हमें हिंदी भाषा के वजूद की चिंता करनी पड़ रही है।

लेखिका एवं आकाशवाणी शिमला में कांगड़ी बोली की उद्घोषिका वंदना राणा ने कहा कि उनके लेख अमर उजाला में भी छपते रहे हैं। वह इस अभियान से बहुत प्रसन्न हैं। हमारी अंग्रेजों से शारीरिक गुलामी तो नहीं है, मगर हम मानसिक तौर पर गुलाम हो गए हैं। हमारी स्थिति यह हो गई है कि हम हिंदी से ठीक से जुड़ ही नहीं पा रहे हैं। प्रदेश के स्कूलों में हिंदी की स्थिति सारी तस्वीर साफ कर देती है।

कवि एवं शिक्षक डॉ. रमेश चंद शर्मा ने कहा कि विश्व के विभिन्न देशों में हिंदी को प्रतिष्ठित भाषा माना जाता है, मगर अपने ही घर में इसकी उपेक्षा हो रही है। हिंदी उपेक्षित जीवन जी रही है। हिंदी का राजनीतिकरण भी देखने को मिल रहा है। आज हिंदी साहित्य में प्रोत्साहन की जरूरत है। हिंदी भाषा को अपना क्लिष्ट रूप भी छोड़ना होगा और इसे अपने सहज और सर्वस्वीकार्य रूप को अपनाना होगा।

युवा कवयित्री मीनाक्षी शर्मा ने कहा कि हिंदी को अपने वास्तविक रूप को अपनाना होगा। हम अंग्रेजी और हिंदी दोनों को मिलाकर बात करते हैं तो यह गलत है, उससे हिंदी का असली रूप कहां रह जाता है। हिंदी को अपनी वास्तविक शुद्धता का ध्यान रखने की भी जरूरत है। इसे खुद को सुगम और सरल भी बनाना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा को अधिक व्यावहारिक बनाए की जरूरत है। 

युवा लेखिका निधि शर्मा ने कहा कि वह हिंदी प्रेमी होने के नाते हिंदी के आकर्षण खोने से चिंतित हैं। वह खुद चाहती हैं कि उनके और उनकी पीढ़ी के बच्चे भी हिंदी पढ़े। वह ईमानदारी के साथ कहती हैं कि उनकी ऐसी अथॉरिटी नहीं है कि वह युवा पीढ़ी को कुछ ऐसा कह पाए कि जिससे उनका हिंदी के प्रति झुकाव पैदा कर सके। हिंदी भाषा के प्रतिष्ठित संस्थान आकर्षण रोजगार दे पाएं तो बात बन सकती है।

युवा कवि एवं प्रशासनिक अधिकारी केवल शर्मा ने कहा कि जैसे बच्चे के जन्म के लिए जननी जरूरी होती है, उसी तरह से विचार के जन्म के लिए भाषा का होना आवश्यक है। जैसे तिरंगे का अपमान अक्षम्य है, वैसे ही राजभाषा का अपमान भी माफ नहीं किया जाना चाहिए। नायब तहसीलदार की परीक्षा में निबंध अंग्रेजी में क्यों, यह हिंदी में क्यों नहीं हो सकता। कुछ साहित्यकार पूर्ण विराम की जगह फुल स्टॉप लगा रहे हैं।

युवा साहित्यकार संजय कुमार ने कहा कि हिंदी भाषा को बढ़ावा देने में हिंदी सिनेमा की बहुत भूमिका है। सिनेमा जगत इस दिशा में बेहतरीन काम कर सकता है। हिंदी हमारे देशवासियों के अंतर्मन की पीड़ा व्यक्त करने की भाषा है। हिंदी भाषा देश के लोगों की अपनी भाषा है। इससे अपनापन महसूस होता है। हिंदी हैं हम जैसे अभियान इस दिशा में श्रेष्ठ प्रयास हैं। वह अमर उजाला का इसके लिए धन्यवाद करते हैं।

युवा लेखिका डॉ. प्रीति प्रज्ञा ने कहा कि हिंदी भाषा में नए शब्दों का प्रयोग हो रहा है, मगर नए शब्द तभी आने चाहिए, अगर पुराने शब्द सही अर्थ प्रस्तुत न कर रहे हों। हिंदी भाषा की शब्दावली के प्रयोग पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा का एक व्यापक शब्द भंडार है। जिसकी समझ इसके व्यापक प्रयोग को बढ़ावा दे सकती है। हिंदी सहज रूप से स्वीकार्य भाषा तभी बन पाएगी। 

युवा लेखक और आकाशवाणी शिमला के उद्घोषक जगमोहन शर्मा ने कहा कि भारत में असल में राष्ट्रभाषा ही नहीं बन पाई है। राजभाषा बेशक हिंदी है, मगर इसे राष्ट्रभाषा जैसा सम्मान नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि सांविधानिक रूप से भी इस दिशा वैसे प्रयास नहीं हुए। जैसे अपेक्षित रहे हैं। हिंदी में सिनेमा, कला जगत ने हिंदी भाषा के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस तरह के प्रयास किए जाने की जरूरत है।

युवा साहित्यकार राजेश सारस्वत ने कहा कि हिंदी से हमारा अस्तित्व है। हिंदी हमारे प्राण और आत्मा है। अपनी पीड़ा को, संवेदना, खुशी को व्यक्त करने की भाषा है। आजादी से लेकर हिंदी भाषा ने हमारा हाथ थामा है। यह दुर्भाग्य है कि युवा वर्ग आज अंग्रेजी भाषा को स्टेटस सिंबल की तरह प्रयोग करता है। इसका भी कारण है कि सरकारी व निजी कार्यालयों में तरजीह भी उन्हीं लोगों को दी जाती रही है। 

युवा कवि अश्वनी शर्मा ने कहा कि हिंदी में शब्दों को समाहित करने की अद्भुत क्षमता है। हिंदी भाषा का राजकीय कार्यालयों में ठीक से इस्तेमाल नहीं किया जाता। पर पुलिस विभाग में यदि आप नकल रिपोर्ट लें तो नाम इतलाह, नंबर शुमार, खुलासा रपट जैसे शब्द, राजस्व विभाग में शजरा नसब, मुसाबी, इंतकाल, ततीमा जैसे शब्दों का प्रयोग सही नहीं है। बिजली बिल तक में अंग्रेजी का इस्तेमाल हिंदी पर हमला है। 

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