विदेशों से लाई जा रही नई-नई प्रजातियों से सेब की परंपरागत किस्में ज्यादा पौष्टिक हैं। सीएसआईआर के हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी संस्थान पालमपुर के अध्ययन से यह बात सामने आई है। पारंपरिक किस्मों में भी विधायन के लिए रॉयल डिलिशियस किस्म सबसे अच्छी पाई गई है। इस बारे में हाल ही में हिमाचल प्रदेश की परंपरागत रॉयल डिलिशियस और गोल्डन डिलिशियस किस्मों के साथ कुछ साल पहले हिमाचल आई कई रेड डिलिशियस, रेड चीफ, रेड गोल्ड आदि किस्मों पर यह अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि रॉयल सेब में सर्वाधिक फेनोलिक कंटेट था।
इसमें एंटी ऑक्सीडेंट क्षमता भी अन्य किस्मों से ज्यादा आंकी गई। इसमें फाइबर भी अन्य किस्मों से ज्यादा पाया गया है। यह शोध पत्र जर्नल ऑफ फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी नाम की शोध पत्रिका में छपा है। इस अध्ययन को शालिका राणा, शशि भूषण आदि विशेषज्ञों ने किया है। यह विशेष है कि रॉयल डिलिशियस किस्म की शेल्फ लाइफ अच्छी होने या इसकी खूबियां पहले भी दुनिया में हुए कई शोधों में सामने आ चुकी हैं।
हिमाचल में 90 फीसदी से ज्यादा फसल रॉयल डिलिशियस की
हिमाचल प्रदेश में 90 फीसदी से ज्यादा सेब की फसल रॉयल डिलिशियस सेब की होती है। ऐसे में इस तरह का अध्ययन प्रदेश के सेब उत्पादक क्षेत्रों के बागवानों के लिए एक सीख भी है। वे नई किस्में मंगवाने की होड़ के बजाय परंपरागत किस्मों का उत्पादन करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
एक सदी पहले सत्यानंद स्टोक्स अमेरिका से लाए थे रॉयल सेब
एक सदी पहले सत्यानंद स्टोक्स अमेरिका से रॉयल सेब हिमाचल लाए थे। उन्होंने इसे पहली बार कोटगढ़ क्षेत्र में रोपा था। यहीं से यह किस्म पूरे प्रदेश में फैल गई। सत्यानंद स्टोक्स का वास्तविक नाम सैम्युल इवांस स्टोक्स था। वह बाद में आर्य समाजी बनकर सत्यानंद स्टोक्स बन गए थे।