सरकार ने बहुप्रतीक्षित मेडिकल यूनिवर्सिटी बिल को विधानसभा में पेश कर पारित करा लिया। कानून बनने और विश्वविद्यालय के शुरू होने के साथ ही प्रदेश में एक भी निजी या सरकारी स्वास्थ्य शिक्षण संस्थान पूरी तरह एक ही व्यवस्था के तहत कार्य करेंगे। अभी तक निजी व सरकारी शिक्षण संस्थाओं की फीस सरकार तय करती थी, लेकिन निजी संस्थान कोर्ट के जरिये कोई न कोई बहाना करते थे।
ताजा उदाहरण महर्षि मेडिकल कॉलेज का सामने आया, जहां मेडिकल कॉलेज ने प्रदेश विश्वविद्यालय के अधीन होने को यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया कि वह महर्षि मेडिकल विवि के अधीन आते हैं। एमएमयू के इसी टकराव के बाद सरकार ने एक मेडिकल यूनिवर्सिटी की जरूरत महसूस की।
इसके अधीन प्रदेश के सभी सरकारी व गैर सरकारी मेडिकल कॉलेज आएं। शुक्रवार को सदन में स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ने भी यही बात कही। कहा कि यह विवि शुरू होने के बाद प्रदेश के हर मेडिकल संस्थान की पढ़ाई से लेकर वहां की फीस तक यही तय करेगा। कौल सिंह ने यह बात विधायक जयराम ठाकुर के एमएमयू द्वारा फीस के नाम पर मनमानी करने के मुद्दे के बाद कही।
इससे पहले मेडिकल यूनिवर्सिटी बिल पेश होने पर नेता प्रतिपक्ष ने बिल को समर्थन देते हुए कहा कि इसकी आवश्यकता पहले से थी, इसलिए इसका समर्थन किया जा रहा है। शिमला शहर के विधायक सुरेश भारद्वाज ने कहा कि अगर सरकार मंडी मेडिकल कॉलेज
में ही प्रदेश मेडिकल यूनिवर्सिटी का प्रदेश मुख्यालय बनाना चाहती है तो आईजीएमसी को स्वायत्त संस्था का दर्जा देने का काम करे। एम्स दिल्ली और पीजीआई चंडीगढ़ के प्रमुख इसी आईजीएमसी से पढ़कर निकले हैं। ऐसे में इस बड़े संस्थान को पीजीआई की तर्ज पर उच्चीकृत किया जाना चाहिए।