हिमाचल प्रदेश में पारंपरिक प्राकृतिक जलस्रोतों जैसे चश्मों, बावड़ियों और नौण को वैज्ञानिक तरीके से मजबूत किया जाएगा। मानसून में बादल फटने, भूस्खलन और भारी बारिश से पेयजल योजनाओं को बार-बार नुकसान पहुंचता है। पाइपलाइन टूटने तथा जलस्रोतों में गाद भरने से पेयजल आपूर्ति प्रभावित होती है, जिससे प्राकृतिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखना राज्य की जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय स्तर पर जल संरक्षण के मंथन के बाद हिमाचल केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय का स्प्रिंग शेड मैनेजमेंट मॉडल अपनाएगा। यह मॉडल केवल चश्मे के आसपास निर्माण के बजाय पूरे जलग्रहण, रिचार्ज क्षेत्र के संरक्षण पर जोर देगा। इससे जलस्रोतों में पानी की निरंतरता बनी रहेगी। योजना में प्राकृतिक जलस्रोतों की वैज्ञानिक मैपिंग होगी। जीआईएस आधारित डिजिटल रिकॉर्ड में स्रोत की स्थिति, पानी का प्रवाह, गुणवत्ता और मौसमी बदलाव दर्ज होंगे। इससे पानी घटने के कारणों का पता चलेगा। हाइड्रो-जियोलॉजिकल अध्ययन से रिचार्ज क्षेत्रों की पहचान होगी। अनियोजित निर्माण नियंत्रित होगा ताकि प्राकृतिक प्रवाह में बाधा न आए।
जलस्रोतों के संरक्षण में प्राकृतिक और इंजीनियरिंग उपायों को साथ लेकर चलने की योजना है। कैचमेंट क्षेत्र में कंटूर ट्रेंच, छोटे चेक डैम और मिट्टी का कटाव रोकने के उपाय किए जा सकते हैं। स्थानीय पौधरोपण से बारिश का पानी जमीन में जाएगा और मिट्टी का कटाव कम होगा। संरक्षण कार्यों को मनरेगा तथा 15वें वित्त आयोग के फंड से जोड़ा जाएगा। इससे जल संरक्षण के काम तेजी से होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिलेगा।
प्राकृतिक जलस्रोतों को मजबूत करने से आपदा में पेयजल आपूर्ति पर दबाव कम होगा। पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने पर स्थानीय प्राकृतिक स्रोत वैकल्पिक जल व्यवस्था देंगे। रिचार्ज क्षेत्रों के संरक्षण से गर्मियों में जलस्रोतों के सूखने की समस्या कम होगी। स्प्रिंग शेड मैनेजमेंट का उद्देश्य केवल पुराने चश्मों का जीर्णोद्धार नहीं, बल्कि जल प्रवाह को लंबे समय तक बनाए रखना है। वैज्ञानिक संरक्षण से दूरदराज के पहाड़ी गांवों में सालभर स्वच्छ पानी मिलेगा, जिससे जलसंकट और मानसून के नुकसान से निपटा जा सकेगा।
स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण, पंचायतों की भी होगी भागीदारी
जलस्रोतों की निगरानी के लिए स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित युवाओं और कर्मचारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। पैरा-हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के तौर पर प्रशिक्षित स्थानीय लोग जलस्रोतों के प्रवाह और उनकी स्थिति की नियमित निगरानी कर सकेंगे। पानी के डिस्चार्ज में लगातार कमी आने पर समय रहते संरक्षण के उपाय शुरू किए जा सकेंगे। जलस्रोतों की सुरक्षा को केवल विभागीय जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रखा जाएगा। ग्राम पंचायतों, जल समितियों, महिला मंडलों और स्थानीय जल उपयोगकर्ता समूहों को भी इसमें शामिल किया जाएगा। स्रोतों के आसपास स्वच्छता बनाए रखना, कचरा और गंदा पानी पहुंचने से रोकना तथा संरक्षण कार्यों की निगरानी स्थानीय स्तर पर की जा सकेगी।
हिमाचल के पारंपरिक जलस्रोत हमारी जल सुरक्षा की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इन्हें वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित करते हुए पंचायतों और स्थानीय लोगों की भागीदारी से लंबे समय तक सुरक्षित रखने पर सरकार का जोर रहेगा। - मुकेश अग्निहोत्री, उपमुख्यमंत्री