स्वायत्त संस्थान हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को पूर्ण रूप से बहाल करने की कवायद शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री ने विवि के स्थापना दिवस समारोह में भरोसा दिया कि विवि की स्वायत्तता को बहाल रखने का फैसला जल्द लेने का भरोसा दिया। इसके लिए विधानसभा में संशोधन विधेयक लाया जाएगा। मार्च 2015 में एचपीयू के अधिनियम 1970 के अनुच्छेद 21 विशेषकर अनुच्छेद 28 में संशोधन कर अनुच्छेद 28(1) को जोड़कर विवि की स्वायत्तता से छेड़छाड़ की गई थी।
इस संशोधन से विवि के कुलपति और विवि की सर्वोच्च निर्णायक संस्था कार्यकारिणी परिषद (ईसी) की शक्तियों को कम किया गया। संशोधन होने से विवि अपने स्तर पर निर्णय नहीं ले सकता। अनुछेद 28(1) के जोड़े जाने से विवि शिक्षकों, गैर शिक्षकों की सेवा संबंधित मामलों जैसे पदों का सृजन, पदों पर भर्ती, पदोन्नति नियमों का निर्माण और संशोधन के मामले पहले विवि की वित्त कमेटी में ले जाने पड़ रहे हैं। वित्त कमेटी की अनुशंसा के अनुसार ईसी में चरचा और अनुमोदन के लिए प्रस्तुत करने पड़ रहे हैं। इससे प्रक्रिया लंबी हो रही है।
कर्मचारियों का तर्क रहता है कि इस संशोधन से विकास और प्रगति के लिए आवश्यक निर्णय लेने में देरी होती है। इसलिए विवि के स्वायत्त स्वरूप को बरकरार रखने को अधिनियम में किए संशोधन पर पुन: विचार कर इसके मूल रूप को बहाल किये जाने की मांग है।
अधिनियम में संशोधन का ईसी में पारित किया था प्रस्ताव
विश्वविद्यालय कार्यकारिणी परिषद की 22 जनवरी 2019 को मद संख्या 24 के तहत अधिनियम में संशोधन को मामला सराकर से उठाने की स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है।
लंबी नहीं रहेगी आवश्यक फैसले लेने की प्रक्रिया
विवि ईसी और वित्त कमेटी के सदस्य बिपिन कुमार का कहना है कि विवि में भर्ती और पदों का सृजन सरकार की स्वीकृति के बाद ही होता है। कार्यकारिणी परिषद में सरकार के वित्त और शिक्षा सचिव, शिक्षा निदेशक नुमाइंदों के रूप में भाग लेते है। उसी में जरूरी फैसले होने चाहिए। इसे अलग से वित्त कमेटी में ले जाने की आवश्यकता नहीं है, चूंकि वहां भी यही अधिकारी सरकार के नुमाइंदे होते हैं।