शहीद अंकेश को सेहरा व नोटों का हार पहनाने के बाद निहारती मां।
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हजारों नम आंखों ने रविवार को घुमारवीं के सेऊ गांव के शहीद अंकेश भारद्वाज को अंतिम विदाई दी। माता-पिता ने शहीद बेटे को सेहरा और नोटों का हार पहनाकर बैंड-बाजे के साथ दूल्हे की तरह अंतिम यात्रा पर विदा किया। बेटे को विदा करते मां कश्मीरी देवी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वह मुक्ति धाम तक साथ गईं। अंकेश के छोटे भाई आकाश भारद्वाज ने मुखाग्नि दी। 11वीं कक्षा में पढ़ने वाला आकाश भाई को अपना आदर्श मानते हुए सेना में जाना चाहता है।
इससे पहले रविवार सुबह नौ बजे जब शहीद राइफलमैन अंकेश (22) का शव घुमारवीं पहुंचा तो पिता बांचा राम पेंट-कोट और पगड़ी पहनकर बेटे का पार्थिव शरीर लेने मुख्य सड़क तक पहुंचे। वहीं, बैंड पर ‘दिल दिया है जान भी देंगे ए वतन तेरे लिए’ धुन बजाकर शहीद का स्वागत किया गया। 6 फरवरी को अरुणाचल प्रदेश के कामेंग सेक्टर में हिमस्खलन की चपेट में आने से शहीद हुए 19 जैक राइफल के जवान अंकेश को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
रविवार सुबह करीब 9 बजे शहीद अंकेश की पार्थिव देह हमीरपुर-बिलासपुर की सीमा पर पहुंची। बिलासपुर सीमा पर दाखिल होते ही वहां दर्जनों युवाओं सहित क्षेत्र भर के लोग बड़ी संख्या में पहुंच गए थे। युवाओं ने सेना के वाहन के आगे बाइक रैली निकालते हुए शहीद को बड़ी शान से घर के नजदीक मुख्य सड़क तक पहुंचाया। मुख्य सड़क से सेना के जवान जब पार्थिव देह घर लाने लगे तो सैकड़ों लोग साथ चले। जगह-जगह फूलों की बारिश की गई। इस दौरान पूरा गांव शहीद अंकेश अमर रहे, भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा। अंकेश अविवाहित थे। इसलिए बेटे को दूल्हा बनाने के अरमानों को पूरा करते हुए माता-पिता ने उसे सजाया और अंतिम विदाई दी।
दधोल से सेऊ तक पैदल निकाली 300 फीट तिरंगे के साथ तीन किमी पैदल यात्रा
शहीद अंकेश के स्वागत में जिले के युवाओं ने तरघेल से बाइक रैली निकाली। वहीं दधोल से सेऊ गांव तक पैदल तीन किलोमीटर 300 फीट लंबे तिरंगे के साथ यात्रा निकाली। इस तिरंगा यात्रा में क्षेत्र के बच्चे, बूढ़े और महिलाएं शामिल हुईं। तिरंगे के साथ शान से शहीद को उसके आंगन तक पहुंचाया गया।
घर से मुक्तिधाम तक खुली जिप्सी में लेकर गए पार्थिव देह
अंकेश की पार्थिव देह को घर से एक किलोमीटर आगे मुक्तिधाम तक खुली जिप्सी में ले जाया गया। रास्ते में लोगों ने पुष्पवर्षा कर अंकेश अमर रहे के नारे लगाकर उन्हें अलविदा कहा। शहीद की मां और अन्य महिलाएं भी मुक्तिधाम (शमशानघाट) तक शहीद को छोड़ने गईं।