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हिमाचल प्रदेश: मृत देहों से खुलासा, जवानी में कई जानलेवा बीमारियां, मरने तक नहीं था पता; अध्ययन में चला पता

Thu, 08 Jan 2026 06:00 AM IST
अंकेश डोगरा अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।

सार

हिमाचल प्रदेश के नेरचौक स्थित लाल बहादुर शास्त्री राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में किए गए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अध्ययन में पता चला कि कई मृत लोग ऐसे थे जिन्हें जवानी में कई जानलेवा बीमारियां थीं लेकिन उन्हें इनका पता ही नहीं चला। पढ़ें पूरी खबर...
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नेरचौक मेडिकल कॉलेज - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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पोस्टमार्टम के लिए लाई जाने वाली मृत देह मृत्यु के कारणों की जानकारी देती है। कई बार यह मृत देह ऐसे गंभीर रोगों का भी संकेत देती है, जिनका जीवनकाल में पता नहीं चल पाता। हिमाचल प्रदेश के नेरचौक स्थित लाल बहादुर शास्त्री राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में किए गए अध्ययन यह खुलासा हुआ है। अध्ययन में शामिल मामलों में से 79.54 फीसदी शव पुरुषों के थे और अधिकांश 21 से 60 वर्ष आयु वर्ग के थे। जांच के लिए भेजे गए 228 रक्त नमूनों में से दो मामले यानी 0.87 फीसदी एचआईवी पॉजिटिव, पांच मामले यानी 2.19 फीसदी हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव, एक मामला यानी 0.43 फीसदी हेपेटाइटिस सी पॉजिटिव पाया गया।

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इन आठ पॉजिटिव मामलों में से एक व्यक्ति में एचआईवी और एचबीवी दोनों का सह-संक्रमण मिला। हैरानी की बात यह रही कि सभी संक्रमित मृतक जीवनकाल में इन बीमारियों से अनजान थे। अध्ययन में यह भी सामने आया कि संक्रमित मामलों में से 85.71 फीसदी युवा आयु वर्ग 16 से 32 वर्ष के थे। पांच मामलों में मृतकों में नसों के जरिए नशा लेने का इतिहास पाया गया। यह तथ्य बताते हैं कि नशे की लत न केवल जीवित व्यक्ति के लिए, बल्कि मृत्यु के बाद स्वास्थ्य कर्मियों के लिए खतरा बन सकती है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लीगल मेडिसिन में प्रकाशित डॉ. अभिषेक शर्मा एवं सहयोगियों के इस अध्ययन में पोस्टमार्टम के लिए लाई गई देहों में एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी संक्रमण की जांच की गई। अध्ययन में कुल 259 शवों को शामिल किया गया।

पोस्टमार्टम स्टाफ के लिए बढ़ता जोखिम
शोधकर्ताओं के अनुसार एचआईवी, एचबीवी और एचसीवी जैसे वायरस मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक शरीर में सक्रिय रह सकते हैं और सुई चुभने, धारदार औजारों से कटने, सीधे संपर्क या तरल पदार्थों के जरिए मेडिकल स्टाफ में फैल सकते हैं। अध्ययन में इन संक्रमणों की दर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय औसत से अधिक पाई गई।
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क्या है समाधान
अध्ययन के निष्कर्षों में सिफारिश की गई है कि पोस्टमार्टम से पहले मृत देहों की अनिवार्य स्क्रीनिंग, मेडिकल एग्जामिन और ऑटोप्सी स्टाफ के लिए कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल, हेपेटाइटिस बी टीकाकरण जैसे उपाय जरूरी हैं। यह अध्ययन न केवल फोरेंसिक चिकित्सा से जुड़े लोगों के लिए, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि मृत देह भी संक्रमण का स्रोत हो सकती है।
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