सुंदरनगर का राज्य स्तरीय नलवाड़ मेला साल दर साल वैभव खोता जा रहा है। कुछ साल पहले तक मंडी में जहां हजारों की संख्या में बैलों का-क्रय विक्रय होता था। बुधवार को पहले दिन मेला की मंडी नगौण में केवल 55 बैल ही देखने को मिले। इनमें से अधिकतर बैल छोटी कद काठी वाली नस्ल के हैं। मेला में बाहरी राज्य से कोई भी व्यापारी देखने को मिला।
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अगर यह सिलसिला आगे भी जारी रहा तो हो सकता है कि राज्य स्तरीय नलवाड़ मेला में वृष पूजन के लिए भी किराये पर बैल लाने पड़ें। खेतीबाड़ी में आज के मशीनी युग में बैलों की भूमिका नगण्य हो गई है। सुकेत संस्कृति साहित्य और जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉ. हिमेंद्र बाली का कहना है कि नलवाड़ मेले का आरम्भ साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर लगभग 225 वर्ष पूर्व हुआ है।
राय साहेब लाला साधुराम की पुस्तक भूगोल सुकेत रियासत संवत 2005 (वर्ष 1948) के अनुसार सुंदरनगर में नलवाड़ का आरंभ 1800 ई. के आसपास तत्कालीन राजा विक्रम सेन ने किया था। रियासत काल में मेले से रियासत को करीब 1 लाख की आमदनी होती थी। यहां पर सबसे अधिक कांगड़ा जिला से किसान बैलों की खरीद को पहुंचते थे। अब 2023 में मेला में पहले दिन महज 55 बैल आना इसके वजूद पर सवाल खड़ा करता है।