हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अगर कोई पत्नी परेशान होकर अपने और अपने बच्चे के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रास्ता अपनाती है, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ मानसिक क्रूरता का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि भरण-पोषण मांगना और घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत के लिए अदालत जाना पत्नी का वैधानिक अधिकार है। ऐसे मामलों को पति के प्रति मानसिक क्रूरता मानना उचित नहीं होगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पति ने पत्नी की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमों को तलाक का आधार बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट ने खारिज की पति की अपील
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने मंडी फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की ओर से क्रूरता और परित्याग के आधार पर दायर तलाक की याचिका खारिज की गई थी। पति का आरोप था कि पत्नी उसके साथ नहीं रह रही थी और उसने उसके खिलाफ धारा 125 के तहत भरण-पोषण तथा घरेलू हिंसा कानून के तहत मामले दर्ज कराए थे। पति ने इन मामलों को झूठा बताते हुए इन्हें मानसिक क्रूरता के दायरे में बताया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कानूनी अधिकार का इस्तेमाल क्रूरता नहीं
अदालत ने कहा कि पत्नी का घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत मांगना और भरण-पोषण की मांग करना उसका कानूनी अधिकार है। कोर्ट के अनुसार, सक्षम अदालत द्वारा पत्नी की ओर से मांगी गई राहत को सही ठहराए जाने के बाद पति का यह कहना कि उसके खिलाफ दर्ज मुकदमे झूठे थे, उचित नहीं है। यानी अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी पत्नी द्वारा अपने अधिकारों की कानूनी सुरक्षा मांगना अपने आप में पति के प्रति मानसिक क्रूरता नहीं बन जाता।
पति को बेटे की जन्मतिथि तक नहीं थी जानकारी
मामले की सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। पति ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उसे अपने सगे बेटे की जन्मतिथि तक मालूम नहीं थी। इस पर हाईकोर्ट ने इसे बच्चे के प्रति घोर उदासीनता और लापरवाही का संकेत माना। अदालत ने कहा कि यह व्यवहार वैवाहिक और पितृ दायित्वों को निभाने की इच्छा नहीं दिखाता।
पत्नी को वापस लाने के लिए भी नहीं किए गंभीर प्रयास
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पति ने पत्नी को वापस वैवाहिक घर लाने के लिए पंचायत, गांव के बुजुर्गों या किसी सम्मानित व्यक्ति की मदद नहीं ली। इतना ही नहीं, पति ने अदालत में दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए भी कोई कानूनी मामला दायर नहीं किया था। अदालत ने इन परिस्थितियों को भी पति की उस दलील के खिलाफ माना कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया था।
दुर्व्यवहार और मारपीट के कारण अलग रहने की बात
मामले में पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि पति उसके साथ बेरहमी से मारपीट और दुर्व्यवहार करता था। इसी वजह से उसे अपना मायका जाकर वहां रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों को देखते हुए माना कि पत्नी पति के दुर्व्यवहार और शारीरिक हिंसा के कारण अलग रहने को मजबूर हुई थी। ऐसी स्थिति में पति पत्नी पर परित्याग का आरोप लगाकर तलाक का हकदार नहीं बन जाता।
2015 में हुई थी शादी
रिकॉर्ड के अनुसार दोनों की शादी 19 अप्रैल 2015 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। दंपती का एक बेटा है। शादी के समय पत्नी चंडीगढ़ में जीएनएम की ट्रेनिंग कर रही थी। पति का आरोप था कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पत्नी उसके साथ रहने के बजाय ज्यादातर समय मायके में रहती थी और अक्सर झगड़ा करती थी।
इसी आधार पर पति ने तलाक की मांग की थी
दूसरी तरफ पत्नी ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा था कि उसे पति की मारपीट और प्रताड़ना के कारण मायके में शरण लेनी पड़ी।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रखा बरकरार
सभी परिस्थितियों को देखने के बाद हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और मंडी फैमिली कोर्ट के फैसले की पुष्टि कर दी। इस मामले में अदालत की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि महिला का अपने वैधानिक अधिकारों के लिए अदालत जाना मात्र इस वजह से मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता कि इससे पति के खिलाफ मुकदमा चल रहा है। साथ ही, तलाक के लिए परित्याग का आधार भी तभी प्रभावी होगा जब यह साबित हो कि पत्नी ने बिना उचित कारण वैवाहिक संबंध छोड़ा है। इस मामले में हाईकोर्ट ने परिस्थितियों को उससे अलग पाया।