हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राजधानी कोष सचिवालय के कोषाधिकारी की कार्यशैली पर टिप्पणी की है। खंडपीठ ने कहा कि अदालती आदेशों की अनुपालना में कोताही न बरतें अन्यथा इसके गंभीर परिणाम होंगे। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान व न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने शिमला के कोषाधिकारी को भविष्य में ऐसी गलती न करने की चेतावनी दी है।
बता दें कि कोषाधिकारी ने तीन वर्ष से अधिक की सेवा लाभ दिए जाने पर आपत्ति जताई और वित्तीय लाभ अदा करने से मना कर दिया था। प्रशासनिक प्राधिकरण ने मेघ राम 1974 के भर्ती नियमों के तहत पदोन्नति लाभ देने के आदेश जारी किए थे। इन आदेशों की अनुपालना में याचिकाकर्ता को पदोन्नति का लाभ देते हुए 12 अगस्त 2009 से आबकारी एवं कराधान अधिकारी के पद पर पदोन्नत किया गया। पदोन्नत करते समय उसके वित्तीय लाभ को तीन वर्ष तक ही सीमित किया गया।
याचिकाकर्ता ने विभाग के इन आदेशों को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। अदालत ने पाया कि वित्तीय लाभ को तीन वर्ष तक ही सीमित करने का कोई आदेश नहीं है। अदालत ने प्रशासनिक प्राधिकरण के निर्णय को लागू करने के आदेश पारित किए थे। अवमानना की कार्रवाई से बचने के लिए विभाग ने वित्तीय लाभ के बिल कोषाधिकारी को भेजा।