प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के सेवा मामलों से निपटने में राज्य के सुस्त दृष्टिकोण को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार को अपने कर्मचारियों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचाने के लिए पारदर्शी और विस्तृत नीति अपनानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को सेवा मामलों में कम से कम मुकदमे वाले राज्य की ओर बढ़ना चाहिए।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने नियमितीकरण से जुड़े मामलों का निपटारा करते हुए अपने फैसले में कहा कि सभी सरकारी विभागों के साथ-साथ राज्य सरकार के विधि विभाग में विधि अधिकारियों की नियुक्तियां मुकद्दमेबाजी कम करने को की गई है न कि अदालतों में अनचाहे मुकदमों को बढ़ाने के लिए। इनकी नियुक्ति राज्य की अधिकतम ऊर्जा और संसाधन का सदुपयोग करने के लिए की गई है ताकि उसे प्रदेश के विकास और कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
राज्य को एक मॉडल नियोक्ता होने के नाते समान रूप से स्थित कर्मचारियों के दावों के लिए उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार में कर्मचारियों से जुड़े विवादों में कोई भी फैसले लेने की जिम्मेदारी वहन करने की हिम्मत नहीं करता है और हर मामले में कोर्ट के फैसले को अधिकारियों द्वारा कर्मचारियों के बीच विवादों का निपटारा करने के लिए सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।
मामले के अनुसार प्रार्थी वर्ष 1996 में वन विभाग में दैनिक भोगी लगे और उन्होंने अपने 8 साल के सेवाकाल पर अपनी सेवाओं को नियमित करने की प्रार्थना की थी। उनका कहना था कि उन जैसे अन्य नियुक्त कर्मियों को विभाग द्वारा नियमित कर दिया था जबकि उन्हें यह लाभ नहीं दिया जा रहा। कोर्ट ने प्रार्थियों की याचिकाएं स्वीकारते हुए वन विभाग को 31 अक्तूबर 2020 से पहले याचिकाकर्ताओं को सभी परिणामी लाभ देने के आदेश दिए।