हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जंगी थोपन पोवारी विद्युत परियोजना के लिए जमा अग्रिम प्रीमियम के 280 करोड़ रुपये मेसर्स अदानी पावर लिमिटेड को दो माह के भीतर लौटाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने 4 सितंबर 2015 में हुई मंत्रिपरिषद बैठक के फैसले को लागू करने के लिए कहा है। न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने मेसर्स अदानी पावर लिमिटेड की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई की। मामले के अनुसार अक्तूबर 2005 में राज्य ने 980 मेगावाट की हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना जंगी थोपन पोवारी पावर के संबंध में निविदा जारी की। मेसर्स ब्रैकल कारपोरेशन को सबसे अधिक बोली लगाने वाला पाया गया। इसे देखते हुए ब्रैकल ने अप फ्रंट प्रीमियम के रूप में 280.06 करोड़ रुपये सरकार के पास जमा करवाए। बाद में सरकार ने परियोजना की दोबारा बोली लगाने का फैसला किया। इसके बाद ब्रैकल ने सरकार से पत्राचार के माध्यम से 24 अगस्त 2013 को मेसर्स अदानी पावर लिमिटेड के कंसोर्टियम पार्टनर होने के नाते 280 करोड़ के अग्रिम प्रीमियम को अप टू डेट ब्याज के साथ वापस करने के लिए अनुरोध किया। ब्रैकल ने कहा है कि याचिकाकर्ता एक वास्तविक निवेशक है और मूल्यांकन और पुरस्कार चरण में शामिल नहीं था। अगर मेसर्स अदानी पावर को पैसे का भुगतान किया जाता है, तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ब्रैकल के अलावा कोई भी पक्ष मेसर्स अदानी पावर लिमिटेड के पक्ष में अग्रिम प्रीमियम जारी करने के लिए शिकायत नहीं कर सकता है।
पीड़ित महिला की शिकायत पर विचार के मजिस्ट्रेट कसौली को आदेश
उधर, महिला को बुरी तरह से पीटने के आरोपों की जांच में ढील बरतने पर हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर खेद जताते हुए महिला की शिकायत पर पुन: विचार करने के मजिस्ट्रेट कसौली को आदेश जारी किए हैं। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने विपाशा की ओर से दायर याचिका पर निर्णय पारित करते हुए कहा कि दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने पुलिस की ओर से दायर की गई स्टेटस रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज की। जिसमें उसने फि र से दोहराया कि जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई है। आपराधिक दंड प्रक्रिया की धारा 156 (3) के प्रावधानों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि पुलिस ने अपना कर्तव्य निर्वहन नहीं किया है या संतोषजनक ढंग से जांच नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप पूरी तरह से यह निष्कर्ष निकालने के लिए मजबूर करते हैं कि पुलिस ने निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम नहीं किया है। केवल पुलिस कर्मियों को बचाने का प्रयास किया गया है। एक बार जब मजिस्ट्रेट को धारा 156 (3) आपराधिक दंड प्रक्रिया में शिकायत मिली थी, जिसमें पुलिस कर्मियों के खिलाफ गंभीर आरोप थे, तो आरोपों की शुद्धता का पता लगाने के लिए जांच के लिए पुलिस को शिकायत भेजनी चाहिए थी। रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद मजिस्ट्रेट या तो इस कारण कार्रवाई को बंद कर सकता है कि शिकायत में निहित आरोपों के संबंध में प्राथमिकी पहले से ही दर्ज है या वह शिकायत में नामित आरोपी के खिलाफ उचित कानून प्रावधानों के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दे सकता है। हाईकोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी कसौली के पारित निर्णय में त्रुटि पाते हुए निर्णय को रद्द करने और आपराधिक दंड प्रक्रिया की धारा 156 (3) के तहत दायर शिकायत पर चार सप्ताह की अवधि के भीतर विचार करने के आदेश जारी किए।