अगस्त 2018 में याचिकाकर्ता का तबादला कांगड़ा जिला के देहरा से लाहौल-स्पीति के काजा किया गया था। अधिकारी ने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों और पत्नी के ज्वालामुखी में कार्यरत होने का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इस दौरान वे लंबी अवधि तक ड्यूटी पर शामिल नहीं हुए। विभागीय जांच के बाद नवंबर 2019 में अनुशासनिक प्राधिकरण ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया, जिसे बाद में एकल जज ने भी बरकरार रखा था। खंडपीठ ने माना कि यद्यपि कर्मचारी को प्रशासनिक आदेशों का पालन करना चाहिए था, लेकिन 19 वर्ष की बेदाग सेवा के बाद सीधे बर्खास्तगी की सजा देना कानून के समानुपातिकता के सिद्धांत के विपरीत है। विभाग के पास वेतन वृद्धि रोकने या लोअर ग्रेड में डिमोशन जैसी अन्य प्रमुख सजाओं का भी विकल्प मौजूद था। अदालत ने पाया कि कर्मचारी के घर में उनकी वृद्ध और बीमार मां, टीबी से पीड़ित सास और गले के कैंसर से जूझ रहा बच्चा था। ऐसे में अदालतों का दरवाजा खटखटाना और ड्यूटी से अनुपस्थित रहना दुर्भावनापूर्ण नहीं, बल्कि पारिवारिक मजबूरियों का परिणाम था।