हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि कर्मचारी भविष्य निधि योगदान को कर्मचारी के वेतन से काटने के बाद भी उसे वैधानिक निधि में जमा नहीं करना एक गंभीर अपराध है। न्यायाधीश राकेश कैंथला की एकलपीठ ने कहा कि इसमें शामिल व्यक्ति पर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है, भले ही वह सीधे तौर पर मालिक न हो बल्कि कब्जेदार की श्रेणी में आता हो। अदालत ने पाया कि लीज के माध्यम से कारखाने का प्रबंधन याचिकाकर्ता को सौंपा गया था। एक कब्जेदार होने के नाते ईपीएफ योगदान काटने और उसे वैधानिक कोष में जमा करने के लिए बाध्य था। अदालत ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया में आईपीसी की धारा 406 की सार को पूरा करते हैं, और ऐसे में एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता।