हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जनहित याचिका के दुरुपयोग पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका समाज के उस कमजोर वर्ग के कल्याण के लिए है, जो खुद अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता। हाईकोर्ट ने निजी दुश्मनी को लेकर दायर की गई जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 2,00,000 का जुर्माना लगाया है।
खंडपीठ ने कहा कि पीआईएल का इस्तेमाल ठेकेदारों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता या निजी हिसाब-किताब चुकता करने के लिए नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कॉन्ट्रैक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया।
कॉन्ट्रैक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने अपने अध्यक्ष के माध्यम से कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें एक अन्य ठेकेदार के खिलाफ जालसाजी और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर करने के आरोपों के तहत सतर्कता जांच और उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी ने याचिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि एसोसिएशन के अध्यक्ष ने प्रतिवादी के बेटे को 20 लाख का चेक जारी किया था, जो बाउंस हो गया था और उसके खिलाफ पहले से ही धारा 138 के तहत आपराधिक मामला चल रहा है। इसके अलावा जिन सरकारी टेंडरों को लेकर विवाद खड़ा किया गया था, उनमें याचिकाकर्ता के करीबी रिश्तेदार खुद भी शामिल थे। प्रतिवादी भी उसी टेंडर की दौड़ में था। कोर्ट ने पाया कि यह सीधे तौर पर व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का मामला है, जिसे जनहित का मुखौटा पहनाकर पेश किया गया।