समान काम का समान वेतन एक नारा ही नहीं, बल्कि एक मौलिक अधिकार है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने साडा के कर्मचारियों की ओर से उच्च वेतनमान की गुहार को लेकर दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं को इस अवधि के भीतर वित्तीय लाभ नहीं दिया गया तो याचिकाकर्ता नौ फीसदी ब्याज के हकदार होंगे। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि न्यायिक प्राधिकरण ही नहीं बल्कि प्रशासनिक प्राधिकरण की ओर से लिया गया निर्णय भी कानून सम्मत होना चाहिए।
याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता साडा में अनुबंध आधार पर कार्यरत थे और वर्ष 2009 ने उन्हें 10300-34800 का उच्च वेतन दिया गया। वर्ष 2014 में उनकी सेवाएं नियमित करने पर उन्हें 5910-20200 का निम्न वेतन दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने प्रतिवेदन के माध्यम से विभाग से गुहार लगाई कि उन्हें भी समान काम के बदले समान वेतन दिया जाए। इसे विभाग ने खारिज कर दिया। विभाग के इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने विभाग की ओर से याचिकाकर्ताओं को कम वेतन देने के निर्णय को खारिज कर दिया और तीन महीनों के भीतर उच्च वेतन उनके नियमितीकरण से देने के आदेश दिए।