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हिमाचल: अनुबंध सेवा को पेंशन के लिए जोड़ने की याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज, जानें पूरा मामला

Sat, 04 Jul 2026 05:40 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि जो कर्मचारी अपनी नियुक्ति और परमानेंट अब्जॉर्प्शन (स्थायी समायोजन) के समय तय नियमों व शर्तों को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर चुके हैं, वे बाद में उन शर्तों से पीछे नहीं हट सकते। 
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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में अनुबंध पर काम कर चुके अधिकारियों की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने नियमितीकरण से पूर्व की अनुबंध सेवा को पेंशन लाभ के लिए अर्हक सेवा (क्वालीफाइंग सर्विसेज) के रूप में जोड़ने की मांग की थी। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि जो कर्मचारी अपनी नियुक्ति और परमानेंट अब्जॉर्प्शन (स्थायी समायोजन) के समय तय नियमों व शर्तों को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर चुके हैं, वे बाद में उन शर्तों से पीछे नहीं हट सकते।

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अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं को साल 2008 में दो साल के अनुबंध पर अधिकारी-विपणन और वसूली (ग्रामीण) के रूप में नियुक्त किया गया था। उनके नियुक्ति पत्र में स्पष्ट लिखा था कि यह सेवा उन्हें स्थायी होने का कोई अधिकार नहीं देती और न ही वे बैंक के प्रोविडेंट फंड/पेंशन फंड के सदस्य बनने के पात्र होंगे। याचिकाकर्ताओं ने तब इन शर्तों को बिना किसी विरोध के स्वीकार किया था। साल 2010 में जब बैंक ने याचिकाकर्ताओं को स्थायी तौर पर शामिल करने का प्रस्ताव दिया, तो उसमें भी साफ तौर पर अंकित था कि वे डिफाइंड कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम या न्यू पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे, न कि पुरानी पेंशन योजना के। कर्मचारियों ने इस पर भी हस्ताक्षर कर सहमति दी थी।

अदालत ने इस बात पर कड़ा संज्ञान लिया कि बैंक ने ई-सर्कुलर के माध्यम से 1 अगस्त 2010 या उसके बाद स्थायी स्केल में शामिल होने वाले कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को पूरी तरह बंद कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने इस व्यवस्था को 14 साल बाद वर्ष 2024 में अदालत में चुनौती दी। अदालत ने कहा कि इतनी देरी के बाद इस मामले को दोबारा नहीं खोला जा सकता। फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता अब सीधे या परोक्ष रूप से यह मांग नहीं कर सकते कि उनकी नियमित नियुक्ति को उनके अनुबंध के दिनों से जोड़कर देखा जाए। चूंकि वे पहले सभी शर्तों को स्वेच्छा से स्वीकार कर चुके हैं, इसलिए अब वे ऐसा दावा करने से कानूनी रूप से वर्जित हैं। कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से योग्यताहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

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