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HP High Court: दिव्यांग कोटे में जातिगत आरक्षण असांविधानिक, 18 साल पुराने पीईटी भर्ती मामले में बड़ा फैसला

Thu, 30 Jul 2026 09:58 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दिव्यांग श्रेणी के भीतर जातिगत उप-आरक्षण नहीं दिया जा सकता। अदालत ने 2008 के पीईटी भर्ती मामले में याचिकाकर्ता होशियार सिंह के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को तीन माह के भीतर नियुक्ति देने और 2008 से काल्पनिक वित्तीय लाभ एवं वरिष्ठता प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को दोहराते हुए कहा कि दिव्यांग व्यक्ति केवल दिव्यांग श्रेणी में आता है, उसमें जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर उप-आरक्षण नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि क्षैतिज आरक्षण के तहत दिव्यांग श्रेणी के पदों में अनुसूचित जाति का कोटा लगाना असांविधानिक और अवैध है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने 18 साल पुरानी पीईटी शिक्षक भर्ती में दिव्यांग उम्मीदवार को नियुक्ति देने का आदेश दिया है।

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अदालत ने याचिकाकर्ता होशियार सिंह की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते राज्य सरकार को उसे शारीरिक शिक्षा शिक्षक (पीईटी) के पद पर वर्ष 2008 से ही काल्पनिक वित्तीय लाभों और वरिष्ठता के साथ नियुक्त करने का आदेश दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि राज्य सरकार 3 महीने में याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र जारी नहीं करती है, तो तीन माह की अवधि बीतने के बाद वह पूरे वेतन का हकदार होगा। अदालत ने याचिकाकर्ता का यह तर्क खारिज कर दिया गया कि केवल कुल्लू जिले के उम्मीदवार को ही पद मिलना चाहिए था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य भर का कोई भी दिव्यांग व्यक्ति प्रदेश के किसी भी जिले में भर्ती के लिए पात्र है।

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गौरतलब है कि वर्ष 2008 में राज्य सरकार ने दिव्यांग श्रेणी के तहत ही सीएंडवी कैडर में पीटीई के पदों को भरने के लिए विशेष अभियान चलाया था। कुल्लू में 27 जनवरी 2008 को हुए पहले इंटरव्यू में याचिकाकर्ता होशियार सिंह ने 38.11 अंक प्राप्त कर मेरिट में पहला स्थान हासिल किया था।

हालांकि, बाद में इस इंटरव्यू को रद्द कर दिया गया। 28 फरवरी 2008 को दोबारा आयोजित इंटरव्यू में राज्य सरकार ने यह कहकर याचिकाकर्ता को चयन से बाहर कर दिया कि श्रवण बाधित(जिसे सुनाई कम देता है) श्रेणी का पद अनुसूचित जाति के दिव्यांग के लिए आरक्षित था, जबकि याचिकाकर्ता सामान्य वर्ग का दिव्यांग है। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि सरकार की ओर से दिव्यांग कोटे के अंदर अनुसूचित जाति का आरक्षण लागू करना पूरी तरह से मनमाना,तर्कहीन और कानून के विरुद्ध था। 
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