प्रदेश हाईकोर्ट ने श्रम कानून के प्रावधानों के दृष्टिगत यह महत्वपूर्ण व्यवस्था की है कि श्रम न्यायालय को यह क्षेत्राधिकार नहीं है कि वह किसी मामले को केवल विवाद को देरी से दायर करने की एवज में खारिज करे। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने यह व्यवस्था नरपत राम द्वारा दायर याचिका को मंजूर करते हुए दी।
कोर्ट ने श्रम न्यायालय को आदेश दिए कि वह दोबारा प्रार्थी के मामले पर सुनवाई करे और मेरिट पर फैसला ले। कोर्ट ने लेबर कोर्ट के फैसले को रद करते हुए यह आदेश दिए कि इस मामले पर 30 सितंबर 2016 तक फिर से फैसला मेरिट आधार पर ले। मामले के अनुसार प्रार्थी 1979 से बिजली बोर्ड में बतौर बेलदार कार्य कर रहा था, उसे 23 मई 1989 को नौकरी से निकाल दिया था।
प्रार्थी अपनी परिस्थितियों के चलते समय पर विवाद नहीं उठा पाया। साल 2002 में जब प्रार्थी ने श्रम अधिकारी के समक्ष विवाद उठाया तो श्रम विभाग ने उसका मामला निपटारे के लिए श्रम न्यायालय को भेजा।
लेबर कोर्ट ने 25 जुलाई 2006 को मामला यह कह कर खारिज कर दिया कि प्रार्थी ने विवाद उठाने में काफी देरी कर दी। हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के फैसले को कानून के विपरीत पाते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।