हिमाचल में भी जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर सेब बिक्री की व्यवस्था करने को बागवानों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। बागवानों का कहना है कि सरकार समय रहते केंद्र से यह मामला उठाए। सेब कारोबार प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। राज्य में हर साल करीब 45 सौ से 5 हजार करोड़ का सेब कारोबार होता है। सेब उत्पादन से बागवानों की साल भर की कमाई होती है। इससे बागवानों के परिवार का भरण-पोषण भी होता है।
लॉकडाउन के कारण बागवानों को सेब मंडियों तक पहुंचाने में कोई समस्या न हो, इसे देखते हुए बागवान सरकार से मांग कर रहे हैं कि कोई ऐसी सरकारी एजेंसी की सेवाएं ली जाएं, जो बागवानों के सेब विपणन में मदद करे। बागवानों का कहना है कि इस बार सेब तुड़ान को श्रमिक नहीं मिल रहे हैं। न ही सेब मंडियों तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था हो पा रही है। बगीचों तक लदानी नहीं पहुंच रहे हैं। ऐसी स्थिति में करोड़ों के सेब कारोबार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
अभी तक सरकार मंडी मध्यस्थता योजना के तहत सी ग्रेड का सेब खरीदती रही है। इस बार बागवान चाहते थे कि ए और बी ग्रेड का सेब भी सरकार की मदद से खरीदा जाए। सरकार ने भी सी ग्रेड के सेब का समर्थन मूल्य तो घोषित कर दिया है, लेकिन ए और बी ग्रेड का सेब बेचने का जिम्मा बागवानों पर छोड़ दिया है।
प्रदेश सब्जी एवं फल उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा कि बागवान चाहते हैं कि जिस तरीके से पिछले साल जम्मू-कश्मीर के बागवानों ने सरकारी एजेंसी ने सेब की खरीद की थी। उसी तरह मार्कफेड हिमाचल के ए और बी ग्रेड के सेब की खरीद करे। लॉकडाउन के कारण बागवानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।