लोक कलाकार स्वर्गीय प्रताप चंद अपने ही राज्य में बेगानों जैसा जीवन जी रहे थे। उन्होंने आकाशवाणी शिमला और दूरदर्शन जालंधर के लिए अनुबंध आधार पर सेवाएं तो दीं, लेकिन उन्हें स्थायी नौकरी नहीं दी गई। उनके योगदान को एक तरह से भुला दिया गया। अनुबंध पर नौकरी के कारण उन्हें पेंशन नहीं मिली। उनके लिखे गीतों और गायकी के बदले कोई रॉयल्टी या अन्य कोई सुविधा नहीं मिली। पंडित प्रताप चंद शर्मा के जीवन के आखिरी साल गुमनामी में कटे।
27 नवंबर को ली आखिरी सांस
91 वर्षीय पंडित प्रताप चंद शर्मा ने 27 नवंबर को नलेटी स्थित अपने निवास पर आखिरी सांस ली। उनके चार बेटे और तीन बेटियां हैं। बड़ा बेटा रोशन लाल शर्मा पुरोहित और राम पाल शर्मा और शिवराम शर्मा कृषि विभाग से सेवानिवृत्त हैं। सबसे छोटे बेटे राधेश्याम वायु सेना में हैं। तारा देवी और संतरी देवी बेटियां हैं। तीसरी बेटी जगदंबा देवी की मृत्यु हो चुकी है।
प्रताप चंद का जीवन परिचय
प्रताप चंद शर्मा का जन्म 23 जनवरी, 1927 को देहरा के नलेटी गांव में हुआ था। जब वे चौथी कक्षा में थे तो पिता झाणू राम की मृत्यु हो गई। परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई। 14 साल की उम्र में सत्या देवी से शादी हुई। 26 जनवरी, 1962 में सरकारी स्कूल परागपुर में हुए समारोह में पहली बार गाने का मौका मिला।
इसी वर्ष लोक संपर्क विभाग में मास्टर श्याम सुंदर की पार्टी में काम करने लगे। पूरी पार्टी को 325 रुपये मासिक मेहनताना मिलता था। साल 1984 से जालंधर दूरदर्शन से जुड़े। 1982 से उन्होंने भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग चंडीगढ़ में काम किया।
ये लोकगीत चढ़े लोगों की जुबान पर
लोक गायक प्रताप चंद शर्मा ने ठंडी-ठंडी हवा जे झुलदी, झुलदे चीलां दे डालू..., दो नारां वे लोको लश्कदियां तलवारां..., जे तू चला नेफा नौकरी..., असां क्या गलाया तां तिजो गुस्सा आया..., कमला विमला जुड़वां भैणा दोहे इकयी नुहारी जी..., मेरे गले दे हारे लैंदा ओयां.., नाले पार गीतां जो जाणां विच विहाए नचणां गाणां चा नाचे दा..., सहित कई गीत लिखे और गाए।
ये मिले सम्मान
प्रताप चंद को कांगड़ा लोक साहित्य परिषद, संस्कृति कला संगम, आकाशवाणी, प्रसार भारती साहित्यकार परिषद और कल्चर सेंटर पटियाला सहित कई निजी संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं।