यूं तो हिमाचल की सियासत कांग्रेस और भाजपा पर ही टिकी है, लेकिन नेताओं का एक तबका ऐसा भी है, जो हर विस चुनाव में अचानक हरकत में आ जाता है। यह वह तबका है, जो या तो अपनी पार्टियों से विद्रोह कर चुनाव में उतर आता है या फिर वे लोग होते हैं जो बस चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरते हैं।
हालांकि, इनमें ज्यादातर वोट काटने वाले ही बनकर रह जाते हैं। सैकड़ों की संख्या वाला यह तबका चुनाव में उतरने के बाद जनता से बदलाव की बात कर पूरी ताकत से मैदान में उतरता है, लेकिन चुनाव में जीत हासिल करने वाले डबल डिजिट में भी नहीं आ पाते। शायद यही कारण है कि सूबे की जनता भी इन सियासी धुरंधरों पर अपना वोट जाया करने से बचती है।
साल 1951 से 2017 तक विधानसभा के 12 बार चुनाव हुए। इनमें करीब डेढ़ हजार प्रत्याशियों ने भाग्य आजमाया। जनता को सियासी दलों की खराब राजनीति का वास्ता देकर नया चेहरा जिताने तक के वायदे किए, लेकिन जीतने वाले प्रत्याशियों की संख्या सैकड़ा भी पार नहीं कर सकी। 1967 के चुनाव में 147 निर्दलीय प्रत्याशियों ने नामांकन किया।
इनमें 16 ने जीत दर्ज की। हिमाचल के राजनीतिक इतिहास में यह अकेला मौका रहा, जब चुनावी नतीजे सामने आने के बाद सबसे बड़े दल रहे कांग्रेस के सामने निर्दलीय ही मुख्य विपक्ष के तौर पर खड़े थे। 1990 में हालात यह हुए कि चुनाव में 193 प्रत्याशियों में से महज एक और 1985 में मैदान में उतरे 136 प्रत्याशियों में से सिर्फ 2 ही जीत दर्ज कर सके।
1982 में लड़े थे 205 निर्दलीय
सूबे के राजनीतिक इतिहास में सबसे ज्यादा 205 निर्दलीय प्रत्याशी 1982 में चुनाव मैदान में उतरे। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशियों के उतरने के बावजूद जीत सिर्फ 6 को ही मिली।
साल 1951 में सबसे कम 51 आजाद प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतने, जिनमें 8 ने जीत का स्वाद चखा था। बावजूद इसके निर्दलीय प्रत्याशी लगातार बड़ी संख्या में मैदान में उतरते रहे हैं, लेकिन 1967 के बाद यह आंकड़ा कभी दहाई के आंकड़े को नहीं छू पाया।
एसोसिएट बनने से घटी निर्दलीयों की साख
आम तौर पर माना जाता है कि निर्दलीय प्रत्याशी वह होता है, जिसे मुख्य राजनीतिक दलों की विचारधारा पसंद न हो, लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि जनता ने जिताया तो प्रत्याशी को निर्दलीय के रूप में था, लेकिन वह बाद में किन्हीं कारणों किसी न किसी सियासी दल के एसोसिएट सदस्य बन गए।
2012 के ही चुनाव में जीते 5 निर्दलीय प्रत्याशियों में से चार कांग्रेस के एसोसिएट सदस्य बन गए, जबकि एक ने चुनावों से पहले भाजपा का दामन थाम लिया। इसी तरह 2003 में ही कुसुम्पटी से निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतने वाले एक प्रत्याशी ने बाद में कांग्रेस के प्रति अपना लगाव दिखा।
ठियोग से चुनाव जीतने के बाद एक प्रत्याशी एक बार कांग्रेस तो दूसरी बार भाजपा के एसोसिएट सदस्य बन गए। जाहिर है निर्दलीय प्रत्याशियों के इसी रवैये के चलते उनकी विश्वसनीयता और साख पर सवाल खड़े होने लगे और जीतने वालों की संख्या घट गई।
कब, कितने निर्दलीय जीते
साल निर्दलीय प्रत्याशी विजयी
2012 105 05
2007 60 03
2003 110 06
1998 52 01
1993 155 07
1990 193 01
1985 136 02
1982 205 06
1977 195 06
1972 148 07
1967 147 16
1951 51 08