रोग की गंभीरता में योगदान देने वाले कारक
कृषि विज्ञान केंद्र रोहडू की प्रभारी डॉ. उषा वर्मा ने बताया कि पौधों में इस रोग की पहचान हुई है। कम वर्षा की स्थिति (नवंबर 2023 से जुलाई 2024) और जून 2024 में रुक-रुक कर बारिश होने से रोग फैला। ज्यादा माइट आबादी ने पौधों के तनाव में योगदान दिया। इससे पत्ती धब्बा रोग और बढ़ा। वैज्ञानिक डॉ. आरती शुक्ला ने कहा कि रासायनिक स्प्रे के अनुचित उपयोग से पौधे कमजोर हो गए। वैज्ञानिक डॉ. शालिनी वर्मा ने कहा कि जिन बागवानों ने विभाग की ओर से अनुमोदित खादों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया है। वहां पर इस बीमारी का ज्यादा प्रकोप देखने को मिला है।
रोग के लक्षण
छाया और अधिक नमी वाले बगीचों में रोग के अधिक लक्षण दिखाई दे रहे हैं। शुरूआती चरण में रोग सेब की पत्तियों पर दिखाई देता है। रोग से ग्रस्त पत्तियों की ऊपरी सतह पर गोलाकार गहरे हरे रंग के धब्बे नजर आते हैं। यह हरे धब्बे पहले भूरे और फिर गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। पत्तियों का शेष भाग पीले रंग का होता जाता है। रोग के पनपने से समय से पूर्व ही पतझड़ होता है। जिससे फलों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। संक्रमित फलों पर भी भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। फलों का विकास भी रुक जाता है। उद्यान विभाग के विषयवाद विशेषज्ञ डॉ. संजय चौहान ने बताया कि बगीचों में अल्टरनेरिया रोग फैलना आरंभ हो गया है। रोग सेब के लिए बहुत घातक है। सेब तुड़ान से पहले ही सेब के पौधे से पत्तियां झड़ जाएंगी। फल भी पूरी तरह से खराब हो जाएगा।