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हाईकोर्ट की सरकार को चेतावनी: मिट्टी संरक्षण, जल संचयन पर बहानेबाजी नहीं, ठोस नीति बनाएं

Thu, 26 Feb 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) की ओर से दायर हलफनामे पर असंतोष जताते हुए इसे मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने वाला करार दिया है।
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अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में मिट्टी संरक्षण और वर्षा जल संचयन के लिए एक समान नीति बनाने में देरी पर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) की ओर से दायर हलफनामे पर असंतोष जताते हुए इसे मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने वाला करार दिया है। खंडपीठ ने अधिकारी को इस मुद्दे पर फिर से विचार करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार विफल रहती है तो न्यायालय को मैंडमस जारी करना पड़ेगा। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि नीति बनाना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है लेकिन जनता के हित में कोर्ट को आदेश जारी करने पर मजबूर होना पड़ेगा। मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल को होगी। अतिरिक्त मुख्य सचिव ने अपने हलफनामे में तर्क दिया था कि राज्य के विभिन्न जिलों की भौगोलिक स्थिति अलग-अलग होने के कारण एक समान नीति बनाना संभव नहीं है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार अलग-अलग स्थलाकृति (टोपोग्राफी) के आधार पर वर्गीकृत नीतियां बना सकती है। कोर्ट के कहा कि एक आकार सबके लिए फिट नहीं हो सकता, लेकिन समान भौगोलिक क्षेत्रों के लिए तो एक जैसी नीति अपनाई जा सकती है।

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अदालत ने सरकार के उस दावे को भी तथ्यों के विपरीत बताया जिसमें कहा गया था कि नीति बनाने के लिए कई विभागों की भागीदारी अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि राज्य की अधिकांश भूमि वन विभाग के पास है, इसलिए विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। न्यायालय ने राज्य में होने वाली प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ठोस नीति के अभाव में बरसात के दौरान मिट्टी का कटाव और भूस्खलन बढ़ रहा है। गर्मियों के सूखे मौसम में जंगलों में लगने वाली आग एक गंभीर समस्या है, जिसके समाधान के लिए जल संचयन और संरक्षण की नीतियां अति आवश्यक हैं।
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