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हिमाचल: धोखाधड़ी के मामले में जालंधर के आभूषण व्यापारियों की याचिका खारिज, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले

Fri, 28 Aug 2026 06:30 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।

सार

हाईकोर्ट ने सोने की किट्टी स्कीम के नाम पर हुई लाखों रुपये की धोखाधड़ी के मामले में पंजाब (जालंधर) के आभूषण व्यापारियों की याचिका को खारिज कर दिया है।
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अदालत(सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोने की किट्टी स्कीम के नाम पर हुई लाखों रुपये की धोखाधड़ी के मामले में पंजाब (जालंधर) के आभूषण व्यापारियों की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश विरेंद्र सिंह की अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए साफ किया है कि भले ही आरोपी व्यापारी जालंधर से अपना कारोबार चलाते हों, लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू में ही चलेगा। भुंतर के आभूषण कारोबारी ने जालंधर की एक कंपनी के मालिकों के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। आरोप है कि पंजाब के इन व्यापारियों ने भुंतर आकर उन्हें एक किट्टी स्कीम में शामिल होने का लालच दिया था।

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उसने स्कीम के तहत कुल 2,823 ग्राम सोना जमा कराया, जिसमें से आरोपियों ने 1,803 ग्राम तो वापस कर दिया, लेकिन बचा हुआ करीब 65,28,000 रुपये कीमत का 1,020 ग्राम सोना वापस नहीं किया। जालंधर के व्यापारियों ने पहले कुल्लू की अदालत में अर्जी लगाई थी कि उनका सारा कारोबार पंजाब में है, इसलिए कुल्लू कोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का कानूनी अधिकार (क्षेत्राधिकार) नहीं है। निचली अदालत ने उनकी अर्जी को खारिज कर दिया। इसी आदेश के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने उनकी दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि चूंकि इस मौखिक समझौते की शुरुआत और डील भुंतर (कुल्लू) स्थित नरेंद्र राणा की दुकान पर हुई थी, इसलिए इस मामले का मुख्य कारण हिमाचल में ही पैदा हुआ है।

पक्षपात के आधार पर एथलीट को हॉस्टल से निकालने का आदेश रद्द
 प्रदेश हाईकोर्ट ने बिलासपुर स्पोर्ट्स हॉस्टल से एक युवा एथलीट को बाहर करने के राज्य खेल विभाग के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने फैसले में साफ किया कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि चूंकि खिलाड़ी और कोच दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए थे, इसलिए उस कोच को स्क्रीनिंग कमेटी का हिस्सा नहीं होना चाहिए था।
अदालत ने कहा कि जहां कोच और खिलाड़ी के बीच परस्पर आरोप थे, वहां उक्त कोच को निष्कासन कमेटी का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए था। केवल इसी आधार पर 16 जून 2026 का निष्कासन आदेश रद्द किया जाता है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को हॉस्टल से निकालने के 16 जून 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया है।

 
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अदालत ने राज्य सरकार व खेल विभाग को निर्देश दिया है कि यदि वे खिलाड़ी के प्रदर्शन का पुनर्मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो कानून के दायरे में निष्पक्ष सदस्यों की नई कमेटी का गठन करें। यह संपूर्ण प्रक्रिया अगले 3 सप्ताह के भीतर पूरी करने के आदेश दिए गए हैं। याचिकाकर्ता अर्पितांश पाठक 7 जून 2024 को बिलासपुर स्थित स्पोर्ट्स हॉस्टल में बतौर एथलीट चयनित हुए थे। वे बिलासपुर के एक स्कूल में 10+2 के छात्र हैं। खेल विभाग ने 16 जून 2026 को खराब प्रदर्शन का हवाला देते हुए उन्हें हॉस्टल से बाहर करने का आदेश जारी किया था। एथलीट ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान सामने आया कि मई 2025 में याचिकाकर्ता ने अपने कोच के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसके जवाब में कोच ने भी छात्र के खिलाफ शिकायत की थी। इसके बावजूद, 1 अप्रैल 2026 को एथलीट के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए बनाई गई स्क्रीनिंग कमेटी में उसी कोच को सदस्य बनाया गया।
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