सतलुज बेसिन में 49 झीलें 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैलीं
सतलुज बेसिन में ऐसी 49 झीलें हैं, 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैल चुकी हैं। इनके अलावा 51 झीलें 5 से 10 हेक्टेयर क्षेत्र में हैं। 2192 झीलों का दायरा पांच हेक्टेयर से कम है। चिनाब बेसिन में लाहौल-स्पीति के सिस्सू के पास गीपनगाथ झील 1975 में 27 हेक्टेयर में थी, जो बढ़कर 110 हेक्टेयर तक फैल गई। इसकी औसत गहराई 36 मीटर है। गीपनगाथ झील का चार गुना से ज्यादा बढ़ना ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना माना जा रहा है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी झील बन चुकी है। यदि प्राकृतिक बांध के कमजोर होने, भूस्खलन, हिमस्खलन या भूकंप के कारण यह झील फटती है तो पानी और मलबे का तेज बहाव उदयपुर क्षेत्र से होते हुए आगे जम्मू-कश्मीर तक तबाही मचा सकता है।
उपग्रह की तस्वीरों में अकेले सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें सामने आईं
राज्य सरकार में आपदा नियंत्रण के परामर्शदाता व हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (हिमकोस्टे) के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा के अनुसार लिस-4 उपग्रह के 5.8 मीटर रिजॉल्यूशन वाले डेटा से 2023 की तस्वीरों के आधार पर परिषद की ओर से किए ताजा अध्ययन में अकेले सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें सामने आई हैं। लिस-3 उपग्रह डेटा 23.5 मीटर रिजॉल्यूशन वाले डेटा में वर्ष 2019 में चिनाब बेसिन में 242, ब्यास में 93 और रावी में 38 झीलें चिह्नित की जा चुकी हैं। भूकंप के दृष्टि से हिमाचल जोन छह में डाल दिया गया है, जबकि पहले इसे जोन चार और पांच में रखा जाता था। उनके मुताबिक नेपाल जैसी स्थिति में भूकंप के बाद अगर कोई ग्लेशियल झील फटती है तो बड़ी तबाही हो सकती है।
विशेषज्ञों ने ये कहा
आमतौर पर ऐसी झीलों के टूटने के प्रमुख कारण हिमस्खलन और भूकंप होते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक हालांकि सभी झीलें खतरे वाली नहीं हैं, लेकिन तेजी से बढ़ रही और अस्थिर झीलों की पहचान सबसे जरूरी है। सतलुज बेसिन में तिब्बत की ओर मौजूद झीलों पर उपग्रह आधारित निगरानी, हिमाचल में संभावित बाढ़ मार्गों की पहचान और पूर्व चेतावनी व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है। तिब्बत में किसी झील के टूटने पर उसका पानी सतलुज के रास्ते हिमाचल में प्रवेश करेगा और इसके बाद इसका असर पंजाब के मैदानी क्षेत्रों तक होगा। हाइड्रो इंजीनियर आरएल जस्टा के मुताबिक सतलुज बेसिन का करीब एक चौथाई क्षेत्र हिमाचल में है, जबकि तीन चौथाई चीन अधिकृत तिब्बत में पड़ता है, इसलिए खतरे का आकलन हिमाचल की सीमा तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
सांगला के देबार कंडे में खतरा बनी यारपाबंग झील
नेपाल में जय प्रलय के बाद से सांगला वैली के लोगों में डर का माहौल है। कारण सांगला के देबार कंडे में बढ़ता जा रहा यारपाबंग झील का क्षेत्रफल है। यहां करीब 550 मीटर लंबी और 260 मीटर चौड़ी झील भूकंप और बाढ़ की स्थिति में बस्पा और सतलुज नदी के मुहाने पर बसे इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है। सांगला वैली के लोगों ने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से यहां सुरक्षा के लिहाज से उचित कार्य करने की मांग की है।
सूबे की चार झीलें सबसे खतरनाक
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमाचल की चार झीलों को सबसे खतरनाक माना है। इनकी निगरानी के लिए अर्ली वर्निंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं। कुल्लू जिले की वासुकी झील के अलावा लाहौल-स्पीति की गिपांग झील (घेपल) है। इसका दायरा भी सबसे अधिक 92.09 हेक्टेयर है। किन्नौर जिले में 15,465 फीट की ऊंचाई पर सांगला घाटी में बास्पा झील का क्षेत्रफल 18.88 हेक्टेयर है। सतलुज बेसन पर काशंग गाड़ में कलका नाम की झील का क्षेत्रफल भी 27.89 हेक्टेयर है। अगर ये झीलें टूटीं तो भारी नुकसान हो सकता है।
2000 की बाढ़ में सतलुज 60 फीट चढ़ी
31 जुलाई और एक अगस्त 2000 की बाढ़ में सतलुज का जलस्तर सामान्य से करीब 60 फीट ऊपर पहुंचा, करीब 200 किलोमीटर एनएच-22 प्रभावित हुआ और 20 पुल व 22 झूले बह गए। 135 लोगों की मौत हुई और नुकसान करीब 1,466 करोड़ रुपये आंका गया।
2005 में पारछू टूटी, 10 किमी एनएच-22 बहा
26 जून 2005 को तिब्बत में पारछू झील टूटने के बाद सतलुज में बाढ़ आई, जिसमें वांगतू से समदो के बीच करीब 10 किलोमीटर एनएच-22 बह गया और 10 पुल व 11 रोपवे तबाह हुए। सरकारी और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करीब 610 करोड़ रुपये आंका गया।
सरकारों को ठोस नीति बनानी होगी कि नदियों के किनारे सरकारी और गैर सरकारी कोई भी निर्माण न हो। यह सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है। अन्यथा इन झीलों में हलचल हुई तो ये बड़ी तबाही ला सकती हैं। हिमाचल से होकर बहने वाली प्रमुख नदियों के बेसिन में 16 ऐसे ग्लेशियर झील आकार ले चुकी हैं, जो कभी भी नेपाल जैसी तबाही मचा सकती हैं। कई झीलों का आकार तीन दशक के अरसे में 44 फीसदी बढ़ गया है। - राजेश्वर सिंह बांश्टू, प्रोफेसर, सिविल इंजीनियरिंग विभाग एनआईटी, हमीरपुर
सीएम सुक्खू ने ये कहा
लाहौल-स्पीति में एक झील बनी है। काफी वर्षों से बनी है। उस पर अध्ययन किया गया है। इस बारे में पिछले दिनों भी बैठक ली थी। कुछ जगह ग्लेशियर कम हो रहे हैं। कुछ जगह बढ़ रहे हैं। इसे देखना पड़ेगा कि क्या परिस्थिति है।- मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू