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Shimla News: हिमाचल की विलुप्त होती कलाओं को बचाएगी गुरु-शिष्य परंपरा योजना

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प्राचीन वाद्य यंत्रों को बजाने के माहिर लोग भी बन सकते हैं गुरु, हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी की पहल
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गुरु को मिलेंगे 5 हजार, शिष्य को अकादमी देगी 15 सौ रुपये
भारती शर्मा
शिमला। हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करने के उद्देश्य से गुरु-शिष्य परंपरा योजना एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में शुरू की है।
हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी शिमला द्वारा संचालित इस विशेष योजना का मुख्य लक्ष्य उन पारंपरिक कलाओं को पुनर्जीवित करना है जो समय के साथ लुप्त होने के कगार पर पहुंच गईं हैं। अब इस योजना में वह लोग शामिल हो सकते हैं जो दम्मामा , दमनघट , गज्जू , दोरू, धौंसा, नगाड़ा, ढोलकू, नागरथ, तमाका, डफले, ढोल, डोलकी और हुडक बजाना जानते हैं। इसके अलावा अन्य कलाओं में माहिर लोग भी इसमें गुरु बन सकते हैं। इस योजना के तहत अनुभवी और पारंपरिक कला में दक्ष कलाकारों को गुरु के रूप में चयनित किया जाएगा। वहीं शिष्यों का चयन भी रुचि और योग्यता के आधार पर किया जाएगा ताकि वह गंभीरता से इन कलाओं को सीख सकें। यह प्रशिक्षण एक साल तक चलेगा। इसमें गुरु और शिष्य दोनों को आदमी की ओर से मानदेय भी दिया जाएगा। इसमें गुरु को पांच हजार और शिष्य को 1,500 रुपये मिलेंगे। प्रदेश में लोक नृत्य, लोक संगीत, हस्तशिल्प, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की कला और अन्य सांस्कृतिक विधाएं सदियों से चली आ रही हैं लेकिन आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण नई पीढ़ी का इन कलाओं से जुड़ाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ऐसे में यह योजना गुरु और शिष्य के पारंपरिक संबंध को पुनर्स्थापित कर इन कलाओं को संरक्षित करने का प्रयास कर रही है।
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हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी शिमला की गुरु शिष्य परंपरा योजना से न केवल सांस्कृतिक संरक्षण को बढ़ावा देगी बल्कि कलाकारों के लिए रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न करेगी। इससे स्थानीय स्तर पर कला के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और युवाओं में पारंपरिक विधाओं के प्रति रुचि विकसित होगी।


यह लोग कर सकते हैं आवेदन
यदि कोई कलाकार पारंपरिक लोक विद्या से जुड़ा हुआ है तो वह इस योजना में गुरु बनने के लिए हिमाचल कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी शिमला की सचिव को ई-मेल या डाक के माध्यम से पत्र भेज सकता है। इस पत्र में आवेदनकर्ता को अपना बायोडाटा और गुरु बनने के लिए अपनी कला के बारे में विस्तार से बताना जरूरी है। अकादमी की कार्यकारी परिषद योजना के लिए गुरुओं का चयन करती है। गुरु के पास कम से कम पांच शिष्य होना अनिवार्य है। एक महीने में शिष्यों की हाजिरी 20 से कम नहीं होनी चाहिए। यदि यह सभी चीजें होंगे तभी यह प्रशिक्षण दिया जाएगा।
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कोट
प्रदेश की पारंपरिक लोक कलाओं के संरक्षण के लिए अकादमी की ओर गुरु शिष्य परंपरा योजना चलाई जा रही है। इसमें पहाड़ी चित्रकला और चंबा रूमाल का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। मंडी में नाट्य रंगकर्म प्रशिक्षण के लिए रखे थे। इस वर्ष के लिए इस योजना में अभी तक गुरु बनने के लिए एक आवेदन आया है।
..श्यामा वर्मा, सहायक सचिव, हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी शिमला
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