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कृषि विभाग का अंग्रेजी में तैयार दस्तावेज देख राज्यपाल ने लगाई क्लास

Thu, 09 Aug 2018 12:32 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कृषि विभाग का दस्तावेज अंग्रेजी में देख उनकी क्लास लगाई। उन्होंने कृषि विभाग के अधिकारियों को साफ शब्दों में कहा कि इस तरह के महत्वपूर्ण दस्तावेजों को अंग्रेजी में प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए। किसानों के लिए हिंदी और सरल भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए था ताकि उनको कुछ समझ आ सके।

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पीटरहॉफ में शून्य लागत खेती पर आयोजित कार्यक्रम सत्र के खत्म होने के बाद जैसे ही कृषि विभाग के अधिकारियों ने हिमाचल प्रदेश विजन 2022 दस्तावेज राज्यपाल को विमोचन के लिए सौंपा तो उन्होंने अधिकारियों की क्लास लगाई।

उन्होंने कहा कि कृषि विभाग के अधिकारियों को पहले यह जान लेना चाहिए कि वे जो भी कार्य कर रहे हैं, वह किसानों के लिए है। जब अधिकारी यह दस्तावेज तैयार कर रहे थे तो उनको यह बात ध्यान में रखनी चाहिए थी कि यह दस्तावेज किसानों के लिए तैयार किया गया है। इसे हिंदी में सरल भाषा में तैयार किया जाना चाहिए था। 
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राज्यपाल के लिए इस्तेमाल नहीं होगा ‘महामहिम’ शब्द, अधिसूचना जारी 
राज्यपाल को संबोधित करते समय अभिवादन के रूप में ‘महामहिम’ शब्द का प्रयोग नहीं होगा। इस संबंध में खुद राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने ही आदेश जारी किए हैं। इसके बाद राजभवन की ओर से इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसकी जानकारी राज्यपाल के सचिव डॉ. अरुण शर्मा ने दी है।

उन्होंने कहा कि औपचारिक अवसरों के दौरान ‘महामहिम’ शब्द के उपयोग को समाप्त किया जाए तथा इसके स्थान पर ‘राज्यपाल महोदय’ शब्दों का उपयोग किया जाएगा और हिंदी में सरकारी टिप्पणियों में ‘राज्यपाल जी’ का उपयोग किया जाएगा। 

किसान, कृषि वैज्ञानिक  प्राकृतिक खेती अपनाएं- राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि किसान समुदाय तथा कृषि वैज्ञानिक अपनी सोच में बदलाव लाकर खुले मन से शून्य लागत प्राकृतिक खेती अपनाएं। जो रसायनिक खेती की मौजूदा प्रणाली को बदलने में मददगार होगा। राज्यपाल पीटरहॉफ  शिमला में कृषि विभाग के शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर राज्य स्तरीय सम्मेलन में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे।

सम्मेलन में किसानों सहित करीब चार सौ प्रतिभागियों ने भाग लिया। उन्होंने कहा कि हाल ही में नीति आयोग के साथ बैठक में स्वीकार किया कि केवल शून्य लागत प्राकृतिक खेती ही किसानों की आय को दोगुना कर सकती है। प्राकृतिक कृषि पर छह बड़े शिविर लग चुके हैं। कहा कि प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुरूप किसानों की आय को दोगुना करने के लिए देश में अभियान चलाया जा रहा है। आंध्र प्रदेश और हमारे गुरुकुल के लाखों किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनाई है। 

सरकार ने किया है 25 करोड़ का बजट प्रावधान- मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि शून्य लागत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए बजट में 25 करोड़ का प्रावधान किया गया है। प्राकृतिक खेती किसानों को खुशहाल बनाने की क्षमता रखती है। सरकार इसे बढ़ावा देने को हरसंभव सहायता देगी।

राज्य की लगभग 90 प्रतिशत आबादी खेतीबाड़ी पर निर्भर है। किसानों ने रसायनिक खादों तथा कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग करना शुरू कर दिया। इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता समाप्त होने के कारण भूमि बंजर हो गई। सरकार प्राकृतिक खेती को प्रभावी ढंग से प्रोत्साहित करना चाहती है। हिमाचल को देश का प्राकृतिक कृषि राज्य बनाने के लिए सांझे प्रयासों की आवश्यकता है।

शून्य लागत प्राकृतिक खेती न केवल लोगों को स्वस्थ भोजन और फल सुनिश्चित करेगी, बल्कि किसानों की आर्थिकी को भी मजबूत करेगी। उन्होंने देसी नस्ल की गायों के प्रोत्साहन पर बल दिया। कृषि मंत्री डा. रामलाल मारकंडा ने कहा कि राज्य में कृषि गतिविधियों में विविधता लाने के भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधान सचिव कृषि ओंकार शर्मा ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा। 

ये रहे मौजूद- मुख्य सचिव विनीत चौधरी, अतिरिक्त मुख्य सचिव श्रीकांत बाल्दी, प्रधान सचिव उद्योग आरडी धीमान, निदेशक ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज राकेश कवंर,  निदेशक सूचना एवं जन संपर्क अनुपम कश्यप, राज्यपाल के सलाहकार शशि कांत,  विभिन्न महाविद्यालयों के कुलपति, राज्य के  प्रगतिशील किसान और राज्य सरकार के अधिकारी भी उपस्थित थे।

हरित क्रांति के नाम पर किसान किए गुमराह- पद्मश्री सुभाष पारेकर ने कहा कि रसायनिक और जैविक खेती नुकसानदायक है। रसायनिक और जैविक खेते से फसलों की पैदावार कर लोगों को जहर खिलाया जा रहा है। हरित क्रांति के नाम पर देश के किसानों को गुमराह किया गया। फसलों की पैदावार में अत्यधिक कीटनाशकों और फफूंद नाशकों का प्रयोग कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया और मिट्टी की गुणवत्ता को चोट पहुंचाई।

पीटरहॉफ शिमला में शून्य लागत खेती पर राज्यस्तरीय सम्मेलन में पद्मश्री सुभाष पारेकर ने कहा कि विदेशी कंपनियों ने षड्यंत्र के तहत देश के किसानों के खेतों की मिट्टी तबाह की। पहले हरित क्रांति के लिए रसायनिक खेती अपनाने को कहा गया। यह बात सही है कि एक समय देश में खाद्यान्न की  कमी थी और लोगों की जरूरत के अनुसार फसलों की पैदावार बढ़ाना अनिवार्य था। इसके बाद जैविक खेती के लिए किसानों को गुमराह किया गया। आज भी देश विदेशों से खाद्यान्न और तेल आयात कर रहा है। 

पारेकर ने कहा कि देश और खासकर हिमाचल के बागवानों और किसानों को शून्य लागत खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। इससे लोगों को जहरीला खाद्यान्न नहीं खाना पड़ेगा और उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ भी नहीं होगा। पर्यावरण और खेतों का उपजाऊपन भी बचा रहेगा। शून्य लागत खेती के लिए देसी और बूढ़ी गायों को पालना लाभकारी रहेगा।

जो गाय जन्म नहीं दे सकती, उसके गोबर की गुणवत्ता अच्छी रहती है। जो देसी गाय दूध देती है, उसका गोबर अपेक्षाकृत गुणवत्ता में थोड़ा कम रहता है। उन्होंने कहा कि विदेशी कंपनियां हाईब्रीड बीज के नाम पर लूटती रही। इन बीचों में रसायनिक खाद न डालने से पैदावार अच्छी नहीं मिली। इन बीजों से अच्छी फसलें लेने के लिए रसायनिक खाद डालनी पड़ती है। जैविक खेती के नाम पर भी विदेशी कंपनियों किसानों को गुमराह किया और लोगों को जहरीले खाद्यान्न दिया गया।

किन्नौर की बेटी ने नमज्ञा गांव में शुरू की शून्य लागत खेती- प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर की बेटी ने नमज्ञा गांव में अपनी मेहनत और लगन से शून्य लागत खेती की शुरूआत कर दी है। छात्रा पनमा यंकित ने क्षेत्र के लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। यही नहीं, जहां पहले पौधों से तीन किलो टमाटर का उत्पादन किया था, वहीं इस साल इस छात्रा ने शून्य लागत खेती अपनाकर फसल की दोगुनी पैदावार ली है। 252 वर्गमीटर खेत में सफल परीक्षण किया है।

डॉ. यशवंत सिंह परमार विश्वविद्यालय से कीट विज्ञान में मास्टर डिग्री कर चुकी किन्नौर के पूह खंड के नमज्ञा गांव की पनमा यंकित वर्तमान में कृषि विवि से पीएचडी कर रही हैं। पनमा ने एमएससी करने के बाद ठान लिया था कि वह अपने गांव में जाकर शून्य लागत खेती अपनाएगी। उसने अपने गांव जाकर शून्य लागत खेती अपनाई और एक ही खेत में एक साथ टमाटर, फ्रांसबीन और बैंगन की पैदावार की।

पनमा यंकित बताती हैं कि उन्होंने शून्य लागत से पैदा सब्जियां बुधवार को राज्यपाल आचार्य देवव्रत को भेंट की। उनका कहना है कि  वह एक ही खेत में टमाटर, फ्रांसबीन और बैंगन की पैदावार कर रही हैं। इससे पहले उनका परिवार खेत में परंपरागत तरीके से एक ही सब्जी उगाता था। शून्य लागत खेती अपनाकर उन्होंने दुगनी फसल ली है। पहले उनको सब्जी की काफी कम पैदावार मिलती थी। वह पिछले दो साल से कृषि फसलों की पैदावार में जुटी शोधार्थी और अब वह शून्य लागत खेती ही करेगी।

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