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देवी सती ने हिमाचल में लिया था दूसरा जन्म : शास्त्री

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शिमला। राजधानी के राधा-कृष्ण मंदिर में महाशिवपुराण के छठे दिन सोमवार को देवी सती के दूसरे जन्म की कहानी सुनाई गई। कथा वाचक हरी कृष्ण पांडेय शास्त्री ने बताया कि देवी सती ने दूसरा जन्म में माता पार्वती के रूप में हिमाचल और मैना के घर जन्म लिया था।बताया कि पर्वतराज के घर जन्म लेने से मां का नाम पार्वती पड़ा। इसके अलावा देवी पार्वती को उमा, गौरी, जगदम्बा, अंबा के नाम से भी पुकारा जाता है। कथा वाचक ने बताया कि पार्वती बचपन से ही छोटे-छोटे शिवलिंग बनाकर उनका पूजन करती थीं, उनके इस भाव को देखकर नारद जी ने पार्वती को तपस्या करने के लिए प्रेरित किया। तब पार्वती ने शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। शिव जी कैलाश पर्वत पर अखंड समाधी लगाकर बैठ गए, तब देवताओं ने शिव जी को जगाने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने अपनी पत्नी रति के साथ शिव की तपस्या भंग करने के अनेक उपाय किए। इसके बाद कामदेव ने अमोघ शक्ति सम्मोहन बाण शिव पर चलाया जिससे शिव जी का तीसरा नेत्र खुल गया और कामदेव वभस्म हो गया।
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रति विलाप करने लगी और भोलेनाथ से प्रार्थना की कि मेरे पति को जीवनदान दें। रति के कहने पर भोलेनाथ ने रति को वरदान दिया कि द्वापर युग में जब श्री कृष्ण का पुत्र प्रद्युम्मन के रूप में तुम्हें प्राप्त होगा तब तक तुम्हारा पति छाया रूप में तुम्हारे साथ रहेगा। कथा में सुनाया कि एक बार ताड़कासुर नाम के राक्षस ने ब्रह्मा की तपस्या की। ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया कि उसकी मृत्यु शिव और पार्वती के पुत्र के द्वारा होगी। वरदान पाकर वह देवताओं को प्रताड़ित करने लगा तब देवताओं ने शिव से विवाह करने की प्रार्थना की। देवताओं ने शिव से कहा कि आप विवाह कीजिए ताकि आपके पुत्र के द्वारा ताड़कासुर का वध हो। शिव प्रसन्न हुए और देवताओं ने शिव जी के विवाह की तैयारी शुरू कर दी। अंत में शिव पार्वती का विवाह धूमधाम से हुआ।
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