हिमाचल मंडी के कोठी गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक राजेंद्र शर्मा ने कहा कि काम, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, द्वेष से मुक्त हृदय में परमात्मा वास करते हैं।
जीव चाहे कितना ही संत, योगी, क्यों न हो जाए, फिर भी विकार रह जाते हैं। इसलिए भोगों पर नियंत्रण रखना चाहिए। कहा कि मानव मात्र को अपनी जिह्वा, श्रोत्रद्वार पर नियंत्रण रखना चाहिए।
परमात्मा कहीं दूर नहीं वह इंसान के भीतर है। अज्ञान और माया की दीवार के चलते आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो पाता। इसलिए अज्ञान और माया के परदे को हटाने के लिए भगवत भजन ही केवल मात्र ऐसा साधन है,जिससे जीव परमात्मा का सानिध्य प्राप्त कर सकता है।
राजा परीक्षित का प्रसंग सुनाते हुए कथा व्यास ने कहा कि मनुष्य को कर्मों का फल हमेशा भोगना पड़ता है। संस्कारों के बिना एक सभ्य,सदाचारी मनुष्य होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
बुधवार के कथा प्रसंग में श्रीकृष्ण जन्म के सुंदर वृत्तांत का वर्णन होगा। श्रीमद् भागवत कथा के आयोजन की पूर्णाहुति शुक्रवार को होगी। इस दिन भंडारा भी लगेगा।