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जजों की नियुक्ति पर क्या बोले पूर्व जस्टिस?

Mon, 28 Jul 2014 07:14 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति गणपत सिंह सिंघवी ने कहा है कि यह बात सही नहीं है कि वर्तमान में जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम की व्यवस्था नाकाम साबित हुई है।
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यह पहले की व्यवस्था से अच्छी है, मगर फिर भी इसमें कुछ संशोधन की जरूरत है। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि इसका विकल्प बुरा भी हो सकता है। इस पर गहन विचार होना चाहिए। उन्होंने न्यायिक लोकपाल की नियुक्ति का भी सुझाव दिया।

सिंघवी ने ये बातें शिमला में हुए भारतीय अधिवक्ता संघ के ‘न्यायाधीशों की नियुक्तियां, जवाबदेही और अधिवक्ता समुदाय’ विषय पर हुए सेमीनार में कहीं। इस सेमीनार को ठीक ऐसे समय में रखा गया है, जब देश भर में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
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सेमीनार में विशिष्ट अतिथि न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी ने कहा है कि न्यायालयों की भाषा लोगों की समझ में आने वाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन कर इसमें बार और अन्य संबंधित संगठनों के साथ परामर्श की परंपरा भी शुरू की जानी चाहिए।

बांबे हाई कोर्ट की अधिवक्ता नीलोफर भागवत ने कहा है कि कारपोरेट जगत न्यायिक एवं शासकीय व्यवस्था को अपने अनुसार ढालने की चेष्टा कर रहा है। उन्होंने इसके समाधान के लिए कदम उठाए जाने पर बल दिया। जाने-माने अधिवक्ता आरएस चीमा ने ऊंची अदालतों तक आम आदमी की पहुंच नहीं हो पाने पर भी चिंता जताई।

भारतीय अधिवक्ता संघ के उपाध्यक्ष बीके पाल ने कहा है कि न्यायाधीशों की लोकसभा और राज्यसभा में लंबित विधेयकों पर पूर्वाग्रहरहित विचार-विमर्श की जरूरत है। इसी से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्वायत्तता बरकरार रह पाएगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष जितेंद्र शर्मा ने की।

इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय न्यायाधीश वीके शर्मा, सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरके महाजन, भारतीय अधिवक्ता संघ के महासचिव सर्वजीत सिंह, जीके बंसल, महाधिवक्ता एवं बार काउंसिल के अध्यक्ष श्रवण डोगरा सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

दो निंदा प्रस्ताव पारित
इस अवसर पर दो निंदा प्रस्ताव पारित किए गए। पहले प्रस्ताव में राजस्थान में श्रम कानून में संशोधन का विरोध किया गया। इसमें कर्मचारियों को हटाने और फैक्टरी एक्ट लागू करने पर ऐसे निर्णय लिए गए हैं, जिसे न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है। दूसरे प्रस्तावों में फिलिस्तीन पर इजराइली हमलों की निंदा की गई।
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