हिमाचल के स्कूलों में फूड एंड सेफ्टी स्टेंडर्ड एक्ट दो विभागों में पिस गया है। स्कूलों में एक्ट की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि एक्ट को स्कूलों में लागू करवाने के लिए स्वास्थ्य महकमे ने साफ गाइडलाइन दे रखी हैं। इधर, शिक्षा विभाग का तर्क है कि अभी साफ नहीं हो पा रहा है कि लाइसेंस किस के नाम से बनेगा और इसकी फीस कहां से भरी जाएगी।
ऐसे में स्कूलों में पुरानी व्यवस्था चल रही है। नियम अनुसार संस्थान का पंजीकरण करवाना या फिर लाइसेंस बनाना जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग इस बारे में कई बार शिक्षा विभाग को पत्र लिख चुका है, लेकिन इसके बाद भी शिक्षा विभाग इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है।
प्रदेश में वर्तमान में लगभग 10,484 प्राथमिक स्कूल है। 1050 के लगभग मिडल स्कूल चल रहे है। इसके अलावा सैकड़ों आंगनबाड़ी केंद्र भी प्रदेश में चल रहे हैं। जहां हर रोज हजारों बच्चों को दोपहर का भोजन परोसा जा रहा है। कायदे से इन सभी स्कूलों का स्वास्थ्य विभाग के पास पंजीकरण होना जरूरी है, लेकिन प्रदेश में ऐसा नहीं हो पा रहा है।
इधर, इस बारे में निदेशक खाद्य सुरक्षा हिमाचल प्रदेश रामेश्वर शर्मा का कहना है कि इस बारे में कई बार शिक्षा विभाग को पत्र के माध्यम से पंजीकरण करवाने को कहा है। उन्होंने साफ किया कि स्कूलों का पंजीकरण करवाया अनिवार्य है।
इधर, इस बारे में शिक्षा निदेशक प्रारंभिक अशोक शर्मा का कहना है कि अभी मामला भारत सरकार के विचाराधीन चल रहा है। जो भी फैसला आएगा उसका पालन किया जाएगा।
नए खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार अगर बिना लाइसेंस और पंजीकरण के कोई पकड़ा जाता है तो उसके खिलाफ तीन लाख तक जुर्माने का प्रावधान है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर स्कूल पर कार्रवाई होती है तो जुर्माना कौन भरेगा शिक्षा विभाग या शिक्षक?
कैसे बनेगा स्कूल का लाइसेंस
इसके लिए विभाग के डेजिगनेटिड अधिकारी के पास आवेदन करना होगा। वहीं स्कूल में खाना बनाने वाली मिड डे मील वर्कर के मेडिकल प्रमाण पत्र भी जमा करवाने होंगे। जिसके बाद विभाग पंजीकरण संख्या जारी करेगा।