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ये तकनीक बताएगी कहां से आई चरस की खेप

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ड्रग्स तस्करी के मामले सुलझाने के लिए हिमाचल कोरिया और आस्ट्रेलिया की तर्ज पर फिंगरप्रिंट प्रोफाइल अपनाएगा। यानी अवैध तस्करी में पकड़े जाने वाले हर नशे के सामान के सैंपल जुटाकर इसकी फिंगर प्रिंट प्रोफाइलिंग होगी। ये एक तरह से डीएनए सैंपल रखने जैसी प्रक्रिया है। खासकर चरस, भांग और अफीम इत्यादि में ये काफी कारगर है।
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फिंगर प्रिंट डाटाबेस लैब में तैयार होने के बाद पकड़ी गई चरस का टेस्ट करके ये पता लगाया जा सकेगा कि ये कहां बनी है और किस रूट से आई है? यानी इसकी क्वालिटी के आधार पर फिंगरप्रिंट बता देगा कि इसे कहां तैयार किया गया है? इससे जांच एजेंसियों को न केवल ऐसे केस सुलझाने में मदद मिलेगी, बल्कि यह भी पता किया जा सकेगा कि राज्य के किस क्षेत्र में कितना नशे का कारोबार हो रहा है?
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तीन साल में दर्ज हुए 1914 मामले

राज्य में वर्ष 2011 से 30 अप्रैल 2014 तक एनडीपीएस एक्ट के तहत नशे के कारोबार के 1914 केस दर्ज हो चुके हैं। ऐसे में जांच एजेंसियों को भी लग रहा है कि इस आधुनिक तकनीक से मदद मिलेगी। इसके लिए स्टेट फोरेंसिक लैब की सहायक निदेशक डा. मीनाक्षी महाजन कोरिया गईं थी। वहां इस प्रक्रिया को समझने के बाद अब इसे हिमाचल की लैब में लागू किया जाना है।

इस आधुनिक तकनीक से राज्य में पाए जाने वाले सभी प्रकार के नशों के फिंगर प्रिंट तैयार किए जाएंगे। इसके लिए लैब के लिए आधुनिक मशीनें खरीदी जाएंगी। यदि योजना सफल रही तो हिमाचल अन्य राज्यों के ऐसे मामलों में सैंपल टेस्ट करेगा।

ड्रग्स की फिंगरप्रिंट प्रोफाइलिंग एक नई तकनीक है। यदि ड्रग्स फिंगरप्रिंट डाटाबेस तैयार हो गया तो इससे मामले सुलझाने में काफी मदद मिलेगी। इस बारे में सरकार को प्रोजेक्ट भेजा जा रहा है।
-डा. अरुण शर्मा, निदेशक फोरेंसिक साइंस लैब जुन्गा
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