फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चांद पर शोध कर रहे वैज्ञानिक ने किया चौंकाने वाला खुलासा, इसरो ने भी माना लोहा

Wed, 15 Mar 2017 04:06 PM IST
राकेश भारद्वाज/अमर उजाला, धर्मशाला
विज्ञापन
विज्ञापन
कहते हैं चांद में भी दाग होता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि चांद की एक सतह बेदाग है। इसरो के स्टडी ऑफ मून प्रोजेक्ट पर काम कर रहे धर्मशाला के वैज्ञानिक ने चंद्रयान सेटेलाइट से मिले डाटा पर शोध के बाद दावा किया है कि चंद्रमा की अगली सतह पर तो दाग है लेकिन पिछली सतह पर दाग नहीं हैं।
विज्ञापन


उनके शोध ये यह बात सामने आई है कि हमें चंद्रमा की पिछली सतह दिखाई ही नहीं देती है। पृथ्वी और चंद्रमा की रोटेशन एक जैसी है। इनकी गति भी बराबर है, ऐसे में हमें चंद्रमा की अगली सतह की दिखती है। 

वंबर 2016 में इसरो ने धर्मशाला कॉलेज में भूगर्भ विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील धर को प्रोजेक्ट का जिम्मा सौंपा। उन्हें चंद्रमा के ओरियंटल बायसन और मूंस रमकस दो हिस्से पर शोध का कार्य मिला है।
विज्ञापन


इसमें चंद्रमा पर चट्टानों, पर्वत शृंखलाओं, दबे हुए क्षेत्र (करिएटर्स) सहित पानी की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। इसके लिए चंद्रयान से करीब 90 फीसदी डाटा एकत्रित कर उन्हें मुहैया करवाया गया है। इसी डाटा के आधार पर उन्होंने दावा किया है। डॉ. धर के अनुसार चंद्रमा के दो हिस्सों पर वे एक सप्ताह के भीतर शोध कार्य शुरू कर देंगे। 
विज्ञापन

क्यों नहीं है चांद की पिछली सतह पर दाग      

दावा है कि चांद की अगली सतह पर इजीनियस एक्टीविट अधिक है, लेकिन पिछली सतह पर ऐसा नहीं है। यानी चांद की उत्पत्ति के बाद से ही अगली सतह पर उल्का पिंडों और ज्वालामुखी गिरने के कारण गहरे गड्ढे पड़ गए हैं जो हमें दाग की तरह दिखते हैं। चांद की पिछली सतह पर ऐसा कुछ नहीं है। इससे चांद की पिछली सतह बेदाग दिखाई देती है।

जेएनयू और धर्मशाला कॉलेज को मिला है प्रोजेक्ट
इसरो के चंद्रयान सेटेलाइट के डाटा पर शोध के लिए उत्तर भारत में केवल जेएनयू दिल्ली और डिग्री कॉलेज धर्मशाला को ही प्रोजेक्ट मिले हैं। स्टडी ऑफ मून प्रोजेक्ट के लिए डॉ. सुनील धर ने करीब दो साल आवेदन किया था।

इसके लिए उन्होंने प्रोजेक्ट तैयार करके इसरो को भेजा था। इसरो के चेयरमैन और निदेशक के समक्ष प्रेजेंटेशन के बाद प्रोजेक्ट में तीन बार बदलाव के बाद इसे नवंबर 2016 में मंजूर किया गया। डॉ. धर इससे पूर्व ग्लेशियरों पर शोध कर चुके हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें